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Sunday, 13 August 2017

हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।

ग्राहक तुम्हें मिलते रहें, हर मौत के सामान के ।
व्यापार खुब फूले फले संग्राम बर्बर ठान के।
जब जर जमीं जोरू सरीखे मंद कारक हो गये।
तब युद्ध छेड़े जाति के कुछ धर्म के कुछ आन के।
विध्वंश हो होता रहे नुकसान मत रविकर सहो।।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

आदेश दे उपदेश दे हर देश का शासक सदा।
जनता भरे सैनिक मरे परिवार भोगे आपदा।
दुल्हन नई नवजात भी करता प्रतीक्षा अनवरत्
करते रहेंगे जिन्दगी भर युद्ध की कीमत अदा।
दस लाख देकर धन्य है इस देश का शासक अहो।
हथियार के सौदागरों यूँ खून तुम पीते रहो।।

प्रतीक्षा हो रही लम्बी, भुलाओ मत चले आओ-

अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।
प्रतीक्षा हो रही लम्बी, भुलाओ मत चले आओ।।

यहाँ तू शर्तिया आये,खबर सुन मौत की मेरी।
दुखी जब सब सुजन मेरे, सुनें वे सांत्वना तेरी।
नहीं मैं सुन सकूँगा तब, अभी आके सुना जाओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

करोगे माफ मरने पर, हमारे पाप तुम सारे ।
करोगे कद्र भी मेरी, पड़ा निर्जीव जब द्वारे।
नहीं मैं देख पाऊँगा, यही तुम आज दिखलाओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

अभी कुछ व्यस्त ज्यादा हो, तुम्हें फुरसत नहीं मिलती ।
कहोगे व्यक्ति उम्दा था, मगर तब देह ना हिलती।
घरी भर साथ बैठो तुम, नही यूँ आज इतराओ।
अजी अब देर क्यों करते, चले आओ चले आओ।

Saturday, 1 July 2017

रविकर के दोहे


जब गठिया पीड़ित पिता, जाते औषधि हेतु।
डॉगी को टहला रहा, तब सुत गाँधी सेतु।।

यदि दुख निन्दा अन्न सुख, पचे न अपने-आप।
बढ़े निराशा शत्रुता, क्रमश: चर्बी पाप ।।

अपनी गलती पर बने, रविकर अगर वकील।
जज बन के खारिज़ करे, पत्नी सभी दलील।।

प्रीति-पीर पर्वत सरिस, हिमनद सा नासूर।
रविकर की संजीवनी, रही दूर से घूर।।

जीवन-नौका तैरती, भव-सागर विस्तार।
लोभ-मोह सम द्वीप दस, रोक रहे पतवार।।

किया बुढ़ापे के लिए, जो लाठी तैयार।
मौका पाते ही गयी, वो तो सागर पार।

रविकर पल्ला झाड़ दे, देख दीन मेह`मान।
लेकिन पल्ला खोल दे, यदि आये धनवान।

वैसे तो टेढ़े चलें, कलम शराबी सर्प।
पर घर में सीधे घुसें, छोड़ नशा विष दर्प।।

Wednesday, 28 June 2017

नारी कटा के चोटियाँ तब चोटियाँ चढ़कर दिखाये।


पुचकारते पापा मगर भाई लताड़े मर्द ताड़े।
आँखे तरेरे पुत्र भी तो आ रहा पति दम्भ आड़े।
जब पैर की जूती कहे जग अक्ल चोटी में बताये।
नारी कटा के चोटियाँ तब चोटियाँ चढ़कर दिखाये।।

Monday, 15 May 2017

है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान


इनके मोटे पेट से, उनका मद टकराय।
कैसे मिल पाएं गले, रविकर बता उपाय ।।


सरिता जैसी जिन्दगी, रास्ता रोके बाँध।
करो सिंचाई रोशनी, वर्ना बढ़े सड़ाँध।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, होवे आत्मोत्थान।।

रस्सी जैसी जिन्दगी, तने तने हालात्।
एक सिरे पर ख्वाहिशें, दूजे पे औकात।।


है पहाड़ सी जिन्दगी, चोटी पर अरमान।
रविकर जो झुक के चढ़े, वो मारे मैदान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हैं नाना व्यवधान।
रविकर झुक के यदि चढ़ो, हो चढ़ना आसान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, फिसलन भरी ढलान।
सँभल सँभल झुक के चढ़ो, होगा आत्मोत्थान ।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, देखो सीना तान।
लेकिन झुक कर के चढ़ो, भली करें भगवान।।

है पहाड़ सी जिन्दगी, हिमनद जंगल झील ।
मिले यहीं संजीवनी, यहीं मौत ले लील ।।

Sunday, 7 May 2017

भली करेंगे राम


झाड़ी में हिरणी घुसी, प्रसव काल नजदीक।
इधर शिकारी ताड़ता, उधर शेर की छींक।
उधर शेर की छींक, गरजते बादल छाये।
जंगल जले सुदूर, देख हिरणी घबराये।
चूक जाय बंदूक, शेर को मौत पछाड़ी। 
मेह बुझाए आग, सुने किलकारी झाड़ी।।


Sunday, 30 April 2017

रविकर के दोहे

सच्चाई परनारि सी, मन को रही लुभाय।
किन्तु झूठ के साथ तन, धूनी रहा रमाय।।

सच्चाई वेश्या बनी, ग्राहक रही लुभाय।
लेकिन गुण-ग्राहक कई, सके नहीं अपनाय।।

मर्दाना कमजोरियाँ, इश्तहार चहुँओर।
औरत को कमजोर कह, किन्तु हँसे मुँहचोर।।

लेकर हंड़िया इश्क की, चला गलाने दाल।
खाकर मन के गुलगुले, लगा बजाने गाल।।

सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।

विषय-वासना विष सरिस, विषयांतर का मूल।
करने निकले हरि-भजन, रहे राह में झूल।।


जार जार रो, जा रही, रोजा में बाजार।
रोजाना गम खा रही, सही तलाक प्रहार।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

किस सांचे में तुम ढ़ले, जोबन बढ़ता जाय।
देह ढ़ले हर दिन ढ़ले, रविकर बता उपाय।।