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Saturday, 30 July 2011

अन्ना को बाबा सा घेर

                (1)

लोकपाल का कच्चा जाल,
कचरा-बकरा होय हलाल |
मगरमच्छ तो काटे जाल,
लेकर बैठा  बढ़िया  ढाल |

व्यर्थ बजावत अन्ना गाल,
करता-रहता सदा बवाल |

काट रहे जो जमके माल,
उनपर करता खड़े सवाल |
सौ करोड़ पब्लिक दे टाल,
ठोक रहा फिर काहे ताल |

                (2)



संघ  से  जोड़े  बैठा   तार,
लेकर  छूरी   दंड   कटार |
अन्ना  के  तो  पैदल  चार,
व्यर्थ  कांपती  है  सरकार |


हाथी   घोड़े   सही   सवार,
मंत्री   की   चौतरफा  मार |

ऊंट-सिपाही सैन्य अपार,
कर अनशन का बंटाधार |
अन्ना  को  बाबा  सा  घेर,
जंतर - मंतर कर  दे  ढेर ||

Thursday, 28 July 2011

इस कोशिश पर तारीफ करें ||

नन्हे-मुन्हे  पांव से,
छोटी-छोटी नाव से |
अपने-अपने गाँव से,
शीतल बरगद छाँव से --
खेल-खेलने आये हैं, मन सबका बहलाए हैं ||

चुन्नू मुन्नू भोर से,
रेस लगाते जोर से,
व्रेवो-व्रेवो शोर से
जमके नाचे मोर से--
सबके मन को भाये हैं, खेल-खेलने आये हैं ||

लम्बी कूद लक्की का
ऊंची कूद विक्की का
जेबलिन थ्रो बाबू का
भार उठाना साबू का---
सोना तमगा लाये हैं, खेल-खेलने आये हैं ||

बड़ी तेज ये  हाकी हैं
एकादश जो बाकी है
ध्यानचंद से जादूगर
कीर्ति फैले दुनिया भर--
फिर उम्मीद जगाये हैं, खेल-खेलने आये हैं ||

मैराथन में मीलों भागे,
मुन्ना-प्रांजल सबसे आगे
बड़ी थकावट उनको लागे
किन्तु जीत की आशा जागे---
जम के जोर लगाए हैं, खेल-खेलने आये हैं ||

Thursday, 21 July 2011

बहन ने परदेशी भाई को दिए जख्म ||

सम्बन्धों  में जब दिखे, अपने तनिक खटास |
बलि का बकरा ढूंढ़ लो,  जो   कोई   हो  पास || 

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

जख्मों का दुर्गन्ध जो,  फ़ैल रहा है आज |
मरहम पट्टी का सही, रहा नहीं अन्दाज ||
                                                                     
क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

दुनिया  की  खातिर किया, भर्ती  नर्सिंग होम,
अग्नि में जलकर बंटा, धरा वायु जल व्योम ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

चुनो फूल सम्मान से,  गये  छोड़ इहलोक |
सगे  हमारे बाप जी,  कर तेरह दिन शोक ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

तेरहवीं  भी  हो  गई, विदा  हुए  मेहमान |
बहनोई-बहिने रुकी, लेकर जमी-मकान ||   

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

घटी  रोशनी  में भला,  बटेगा  कैसे  माल |
फूल झाड़कर के जरा, फिरसे दीपक बाल ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

अपना  हिस्सा  पाय  के,  धूनी  रहे  रमाय |
इक मकान में "सात" घर, देखो रहे समाय ||


क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी ||

था  दहेज़  मोटा दिया, कर्जा  भरा कमाय,
बहिनों के वर्ताव से, घर-भर गए अघाय ||

क्यों भाई जोशी  ?
हाँ पडोसी || 

Tuesday, 19 July 2011

सत्य शाश्वत है अटल

अमर शहीद मंगल पाण्डे !!
सादर नमन ||

लेखनी है परेशां, न रच रही कोई गजल |
पेट से क्या हो गई, चूस स्याही दे उगल ||

शब्द तो स्वर बोध केवल,
भाव ही मतलब असल |
लुप्त  हो  जाएगा  अनृत, 
सत्य  शाश्वत  है  अटल ||

है  परिश्रम  मूल में  पर, 
भाग्य  से उगती फसल |
आस्मां का भ्रमण कर ले,
फिर के आये भू पटल  ||

बुद्धि का अंकुश हटा दे, 
मन  रहा ज्यादा मचल |
स्रोत्र  सूखें  सूख जाएँ , 
किन्तु न हिलता अचल ||

करती  तरंगें  चिड़ीमारी, 
बैठ अपने हाथ  मल |
हाथ  पर  सब  हाथ रक्खे, 
कोसते आजकल ||

दिग्विजय  ने  कहा  की  वो  किसी  को
( उज्जैन में भा जा यु मोर्चा के कार्यकर्त्ता को) 
थप्पड़ नहीं मार सकते ||
हाँ भाई आप तो लतिया सकते हैं ||
( जनार्दन पर जूता काण्ड के पत्रकार को )

Friday, 15 July 2011

बाबा बहुत बुलाये रे --

 प्रेरक - शास्त्री जी और शर्मा जी 
                                  (1)
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन  बड़ा  सताए  रे |
गठिया की पीड़ा से ज्यादा, मन-गठिया तडपाये  रे |
भटक-भटक के अटक रहा ये, जिधर इसे कुछ भाये रे  |
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन  बड़ा  सताए  रे ||1||
                                 (2)
बच्चों के संग अपना जीवन, मस्ती  भरा  बिताया  रे |
रोज साथ में खेलकूद कर, नीति-नियम सिखलाया रे |
माता  वैरी, शत्रु  पिता  जो,  बच्चे  नहीं  पढाया   रे |

तन्मयता से एक-एक को,  डिग्री  बड़ी  दिलाया  रे  ||2||
                                 (3)
गये सभी परदेस कमाने, विरह-गीत मन गाये रे |

रूप बदल के आजा बचपन, बाबा  बहुत बुलाये रे |
गठिया की पीड़ा से ज्यादा, मन-गठिया तडपाये रे | 
आजा वापस प्यारे बचपन, पचपन बड़ा सताए रे ||3||

जनता पूछे देश में, कितने महिने और |

Wednesday, 13 July 2011

चाट रहे वे माल, नमक हम बिना जरुरत ||

बिना  जरुरत  के  सभी, खाओ आयोडीन,
कई  विदेशी  कम्पनी, पीसी  बड़ा  महीन |
 

पीसी  बड़ा  महीन, नमक  के  बने  दरोगा,
महंगाई  का  बोझ, आम  जनता  ने  भोगा |
 

वही  लुटेरे  रोज ,  जेब   सबही   की  घूरत,
चाट रहे  वे  माल,  नमक हम बिना जरुरत  ||

Tuesday, 12 July 2011

12 जुलाई को कटा 25 वाँ मुर्गा

जश्न  मनाती  जा रहीं,  बेगम  मस्त  महान,
अंगड़ाई   ले   छेड़  दीं,    वही   पुरानी  तान |

वही    पुरानी  तान,   सुबह  से रौनक  भारी-
करके फिर  ऐलान,   करीं  जम   के  तैयारी |

 है  रविकर अफ़सोस,  कभी  न  मुर्गा  लाती,
"पर" काटी  पच्चीस, जीत का जश्न मनाती ||

पर काटी  /  पर  काटना ||
वैसे तो हमारे यहाँ बकरे की कन-कट्टी भी की जाती है, सांकेतिक बलि ||
 
                       

Monday, 11 July 2011

उठकर सुबह भूमि बन्दन कर किरतन-भजन बजाता था | नित्य-क्रिया से होकर निवृत्त, योगासन अजमाता था | ---- स्नान - ध्यान से फारिग होकर, गरम कलेवा खाता था |---- ट्वेंटी - ट्वेंटी समाचार से मन बहलाने जाता था

ट्वेंटी - ट्वेंटी  समाचार --

लेकिन दर्शन-दूर है |
हरदिन का दस्तूर है --

मोहन करते माँजी-माँजी,   आर एस एस ने लाठी भांजी |
राहुल मोस्ट वांटेड बेचलर,  दिग्गी  उनके  हाँजी  हाँजी |
महा-घुटाले-बाज तिहाड़ी,  फटकारे नित चाबुक  काजी |
कातिल का महिमा-मंडन,  जीते जालिम  हारी  बाजी--

आदत से मजबूर है |
हरदिन का दस्तूर है -

बड़ी शान से अपनी करनी हारर-किलर सुनाता जाये |
सालों  बन्द कोठरी अन्दर बहिना अपनी मौत बुलाएं |
कहीं  बाप  के अनाचार  का  घड़ा    फूटने  को आये |
बेटी - नौकर - चाकर  सारे  फूटी   आँख   नहीं  भाये--

बनता कातिल क्रूर  है |
हरदिन का दस्तूर है --

भाई   भाई   काट रहा , तो  कही  भीड़  का  न्याय है |
उधर  नक्सली रेल  उडाता, इधर पुलिस असहाय है |
कालेधन  के   भूखेपन   पर  बाबा   गया  अघाय है |
लोकपाल के दल-दल पर दल जुदा-जुदा दस राय है--
 
दिल्ली लगती दूर है 
हरदिन का दस्तूर है --

बड़ी सोनिया सा चल करके  छटी-सानिया ने देखा 
हाथ  पे  उसने  अपने  पाई  तब पाकिस्तानी  रेखा |
सट्टेबाज - खिलाड़ी सबकी लाजवाब लगती एका |
बेशुमार ताकत से  हरदिन  बदल रहे  रब का लेखा --

ताकत से मगरूर है | 
हरदिन का दस्तूर है --

Saturday, 9 July 2011

और 'रविकर' ने उठाई कलम चूमा ||

संजीवनी तुझको मिली आखिर कहाँ ? 
रे कवि सच-सच बता कुछ मत छुपा ||

                     तीस वर्ष  पहले गज़ब घायल हुआ
                     दिल के सौ टुकड़े हुए मर-मर जिया |
                     काबिल  बड़े  इन्सान  थे,  ज़र्राह था 
                    दिल के वे  टुकड़े सिले, कायल हुआ ||
                    परहेज  से  बचकर   रहा,   पाई   दवा
                    नेपथ्य  से  अपथ्य  ये  बोला  गया -

सौंदर्य  पर  आकृष्ट  होना   भूल  जा
रे कवि सच-सच बता कुछ मत छुपा ||

                     चूक लेकिन हो गई एक रोज़ दिल से  
                     आस्मां  उस  भोर  मादक  सुर्ख  था |
                     कूक कोयल की सुनी ऋतुराज आया 
                     सारिका की टेर ने फिर गज़ब ढाया |
                     साज-सरगम ने किया खिलवाड़ दिल से 
                     बदन-बुद्धि  सीख  सारे  गए  हिल से --

बाग़-बागम हो गया दिल मस्त झूमा, 
और  'रविकर' ने उठाई कलम, चूमा ||

प्रीत के गीत नहीं बिसराना,

बातें सोन-चिड़ी की ||

 

Friday, 8 July 2011

कई तरह के करों से, लगिहै मुर्ग-कबाब |

घर  की  चटनी-रोटियां, सदा मौज से चाब,
कई तरह के  टैक्स से,  लगिहै  मुर्ग-कबाब |

लगिहै  मुर्ग-कबाब, चला दतखुदनी   ऐसे, 
हो  मुर्गे  की  टांग , फँसी  दांतों  में जैसे |

कर  अभिनय  पुरजोर, डकरते  निकलो बाहर |
मँहगाई पुरजोर, चले अब ऐसे ही घर ||

Wednesday, 6 July 2011

तन के घाव, मन के लड्डू ||

नहीं  चाहिए  मरहम  सुन  रे  बे-दर्दी।
नहीं   चाहिए   तेरी   कोई   हमदर्दी।।

घाव  हमारे  बे-हद  हमें अज़ीज़ लगें,
सादे  जीवन  में  इसने  रौनक भर दी।

ठहर-ठहर  कर  भरता  उच्छवासें जैसे
"रविकर"  को  है  हुई  ज़रा खाँसी-सर्दी।

तड़पूं   चाहे  तड़प-तड़प  के  मर  जाऊं,
तुमने  सिलवा  दी  मेरी  फौजी  वर्दी |

तन  के  घावों  की चिंता अब नहीं मुझे
अंतर-मन  में  विरह-वेदना  की *कर्दी | 

Monday, 4 July 2011

जिंदगी तो योजनाओं से परे है |

जिन्दगी में योजनायें क्या बनाये 
जिंदगी तो योजनाओं से परे है |
कौन-कब-कैसे-कहाँ-क्योंकर मिला,
प्रश्न ही यह कल्पनाओं से परे है ||
हम-हमी-हममे हमारा वक्त सारा 
जिंदगी इन भावनाओं से परे है |
है नहीं कोई नियंत्रण आत्मा -
विज्ञान की अवधारणाओ से परे है ||
हो पास तो एहसास  होते खुशनुमा
पाक है जो वासनाओ से परे है |
करणीय  था, या निषेधक वाकया
जिंदगी तो वर्जनाओ से परे है ||
वक्त का तूफान हो या जलजला
मित्रता संभावनाओं से परे है |
जिन्दगी में योजनायें क्या बनाये
                      जिंदगी तो योजनाओं से परे है ||

मेरे मित्र दीपक की रचना

मेरे  मित्र  दीपक की,  महा -लफंगों  में   
गिनती  होती  है  यहाँ |
उनकी डायरी का एक पन्ना मिला मुझे 
जस का तस प्रस्तुत है --

शंका   के   बादल  मंडराए  उनको  दूर  करो |
तुम अपने विश्वास सूर्य से जीवन धूप भरो ||

रिस-रिस रिश्ते, रिसते-रिसते रीते हुए नयन |
शादी मुझसे प्यार किसी से कैसा किया चयन ||

 होंठ से बाहर निकले नगमें तेरा नाम लिए |
और किसी की खातिर हमने अपने होंठ सिये ||

सिले होंठ की कसम खामियां कभी नहीं देखी-
तू  ही  मेरी  एक  अकेली  कष्ट  अपार  हरो ||

शंका   के   बादल  मंडराए  उनको  दूर  करो |
तुम अपने विश्वास सूर्य से जीवन धूप भरो ||

                                 चाहत की स्वप्निल  दुनिया में तिनका-तिनका जोड़ा |
                                  प्रिये  बताओ   कारण  क्या   जो  मेरा  सपना  तोडा | |

                                   दर्द  से व्याकुल जीवन में तुम  नश्तर चुभा  रहे |
                                   तड़पाने  से  अंत  भला  क्यों  दुनिया  लुभा  रहे ||

                                    सारी  खुशियाँ  सारा  वैभव  अपने  प्रियतम  पर |
                                    करूँ  निछावर  अपना जीवन  होगी  प्रीति अमर ||     

अमर प्रीति की खातिर दीपक तिल-तिल जलता है |
जलते   दीपक   की   बाती   को   यूँ   न  *पूर  करो ||          *बुझाना      
           
शंका   के    बादल   मंडराए    उनको   दूर   करो |
तुम  अपने  विश्वास  सूर्य  से  जीवन  धूप  भरो ||

Saturday, 2 July 2011

छुपा जाते हैं गुलाब --

ओए, कैसे हैं ज़नाब ?
बड़े  वैसे  हैं  ज़नाब !
किसी को मुर्ग-मुसल्लम
बन्दे का खाना खराब ||

टालते  सारे  सवाल
दीखते हाज़िर जवाब |
भेंट  करते  हैं  गेहूं -
छुपा जाते हैं गुलाब ||

पिला देते हैं पानी
नशा देता है शबाब.
छुपे रुस्तम हैं आप
यही तो लब्बो-लुआब

Friday, 1 July 2011

याद प्रिय आते रहो

याद प्रिय आते रहो कुछ इस तरह,
मन-समंदर में कि जैसे  ज्वार आये|

प्रत्येक दिन एक बार हौले से सही,
मास में पुरजोर प्रिय दो बार आये |

पूर्णिमा की चांदनी अथवा अमावस,
तार  के  बेतार   से   टंकार   आये |

सीपियों-शंखो की  भाषा में लिखे,
हृदय-तट पर प्यार फैले प्यार आये |

किरणे-उजाले - धूप-तारे - चांदनी,
की शिकायत तू मिटा दे  द्वार आये|

काम का बन्दा,  नकारा  हो चुका, 
शब्द-भावों पर जरा अधिकार आये |

जब कभी होगी प्रिये नजरे-इनायत,
और 'रविकर' शायरी में धार आये ||