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Monday, 12 March 2012

सृष्टि सरीखी सजग सयानी, केश सुखाती माढ़ा


कविता-काढ़ा 
प्रतुल वशिष्ठ  

पागल पथिक प्रलापे पथ पर, प्रियंवदा के पाड़ा ।
सृष्टि सरीखी सजग सयानी, केश सुखाती माढ़ा ।
ध्यान भंग होते ही मारे,  डंक दुष्ट इक  हाड़ा ।
प्रियंवदा की चीख निकलते, पथिक ठीक हो ठाढ़ा ।।

 
पाँच लाख प्रतिवर्ष है, पाँच फूट दस इंच ।
शक्लो-सूरत क्या कहें, दोष रहित खूब टंच ।
दोष रहित खूब टंच, गुणागर बधू चाहिए ।
गौर-वर्ण,  ग्रेजुएट, नौकरी तभी आइये ।
झेलू मैं भी दंश, टी सी एस में बिटिया ।
किन्तु साँवला रंग, खड़ी कर देता खटिया ।।

मिटटी का पुतला पड़ा, मिटटी से क्या मीत ।
मूढ़मती पढ़ मर्सिया, चली आत्मा जीत ।

 
my expressions.....याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन..इन्हें मेरी डायरी के कुछ पन्ने समझ लें..बिखरे से


दवा आज तक जिनसे पाई, वही दर्द जब देते हैं ।
गर्दन पर उस्तुरा फेर दें , क्यूँकर पहले सेते हैं ?
बकरे की माँ खैर मनाती, आज कहाँ पर बैठी है --
गैरों से क्या करूँ शिकायत,  अपने अपयश लेते हैं ।
गाफिल हैं ना व्यस्त, चलो चलें चर्चा करें,
शुरू रात की गश्त, हस्त लगें शम-दस्यु कुछ । 

कन्या के प्रति पाप में, जो जो भागीदार ।
रखे अकेली ख्याल जब, कैसे दे आभार ।  
कैसे दे आभार, किचेन में हाथ बटाई ।
ढो गोदी सम-आयु, बाद में रुखा खाई ।
हो रविकर असमर्थ,  दबा दें बेटे मन्या *। 
  सही उपेक्षा रोज,  दवा दे वो ही कन्या । 
*गर्दन के पीछे की शिरा
  पूर्वांचल ब्लॉग लेखक मंच 
खट-खट खट खट अँगुली करती, पट पट पट पट अक्षर ।
युद्धभूमि वीरों का आसन, वहाँ करे क्या मच्छर ।
आल्हा गाने वालें तोड़ें,  इक झटके में तख्ता 
बहुत बहुत एहसान सुनाया, करूँ वन्दना सादर ।।
दिनेश की टिप्पणी : आपका लिंक  
dineshkidillagi.blogspot.com

6 comments:

  1. रविकर जी,
    आपकी कविताओं में भी उस गुड़ का स्वाद आने लगा है जो प्रायः गूंगा चखता है.

    इसके अर्थ करने में भी वैसी ही मेहनत हो रही है जैसी कि आपने मेरे घर पर आकर की थी.

    कहीं ये बदला तो नहीं? ...

    एक कहानी याद आ रही है... "लोमड़ी और सारस पक्के दोस्त थे .... एक बार लोमड़ी ने सारस को दावत दी.. " आगे की कहानी सभी जानते ही होंगे.

    मेरे लिये इस छंद के एकाधिक अर्थ हो चले हैं.

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  2. वाह!
    बहुत खूब!
    बढ़िया सृजन किया है आपने!

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  3. हो रविकर असमर्थ दबा दें बेटे मन्या!
    सही उपेक्षा रोज, दवा दे वो ही कन्या!!
    रविकर जी,..बढ़िया सृजन किया है,....क्या बात है.....

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  4. मिटटी का पुतला पड़ा, मिटटी से क्या मीत ।
    मूढ़मती पढ़ मर्सिया, चली आत्मा जीत ।
    बेहतरीन प्रस्तुति ,आभार .

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  5. अपनी टिप्पणी से हमारी रचना में चार चाँद लगाने के आपका शक्रिया....
    सादर.

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  6. waah bahut khoob.... hamari rachna ki khoobsurat vyakhya... aabhar

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