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Saturday, 21 April 2012

बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष -


पुस्तक आत्मौषधि सही,  सुनो थीब्स का पक्ष  ।
बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष ।

बिन खिड़की का कक्ष, पुस्तकें चखते  बेकन ।
निगल जाय कुछ मस्त, पचाते उत्तम लेकिन ।

पुस्तक पढ़ें मनोज, खरीदें खुद से भरसक ।
प्रेमचंद की बात, मान कर पढ़िए पुस्तक ।।  

रोजमर्रा के दर्द

  उन्नयन (UNNAYANA)

दर्द भी देता मजा -
हम आजमाते जा रहे |
राशन दुकाने ठप्प हैं -
हम गम हमेशा खा रहे |।


काला-बजारी जोर पर-
है कृपा उसकी पा रहे |
टैक्स देते  ढेर सारे-
अब करप्सन ला रहे || 

किसन अर्जुन

  चला बिहारी ब्लॉगर बनने
बजे बधावा जोर से, 'वीणा' के दो साल । 
बड़े 'करीने' से रखी, सब सुरताल संभाल ।

सब सुरताल संभाल, सुनी गासिप 'चौबल' की
कुछ एजेंट विनोद, खबर रखते पल-पल की ।

जो चैतान्यालोक, मनुज भारती पठावा ।
ब्लागे ढोल बजाय, जोर से बजे बधावा ।।

मुझको नींद नहीं आती है.............


नींद उड़ाने वाले सुन ले, 
हो जाये बदनाम कहीं ना ।
पिंड छुडाने वाले सुन ले, 
होवे काम तमाम कहीं ना ।

तूने वीरानापन छोड़ा, 
क्या भूल गई कसमे-वादे
वापस आ जा संग सुला जा, 
मिलता है आराम नहीं ना ।।


"1300वाँ पुष्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



खिलें बगीचे में सदा, भान्ति भान्ति के रंग ।
पुष्प-पत्र-फल मंजरी, तितली भ्रमर पतंग । 

तितली भ्रमर पतंग, बागवाँ शास्त्री न्यारे ।
दुनिया होती दंग,  आय के उनके द्वारे ।

नित्य पौध नव रोप,  हाथ से हरदिन सींचे ।
कठिन परिश्रम होय, तभी तो खिलें बगीचे ।।

यह मन भी ...


मन की मनमानी खले,  रक्खो खीँच लगाम ।
हड़-बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।

पड़ें चुकाने दाम, अर्थ हो जाय अनर्गल ।
ना जाने क्या कर्म, मर्म को लगे उछल-कर ।

सदा रखो यह ध्यान, शीर्ष का चुन लो प्राणी ।
रखिये उसका मान,  रुके मन की मनमानी ।



"फूलों की बातें"

  "उल्लूक टाईम्स

फूलों पर उल्लू फ़िदा, उगले ऊल-जुलूल ।
रविकर जैसे फूल को, जाता फिर से भूल ।

जाता फिर से भूल, बड़े झाड़ों में उलझा ।
उनका बना उसूल, यहीं पर जाएँ मुरझा ।

पर भाई उल्लूक, सितम अब उनके भूलो ।
अवसर यह मत चूक, खिलो खुब जम के फूलो ।।  




 



5 comments:

  1. पुस्तक आत्मौषधि सही, सुनो थीब्स का पक्ष ।
    बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष ।
    बढ़िया रूपांतरण काव्यान्तरण पूर्व पोस्ट का .

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    लिंक आपका है यहीं, कोई नहीं प्रपंच।।
    आपकी प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  3. This comment has been removed by the author.

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    Replies
    1. ़़़़़
      उड़ा लीजिये जनाब उल्लू
      जब भी मन करे आपका
      वैसे बता दूं ये तो पंछी है
      बस केवल रात का।
      ़़़़
      आभार !

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  4. उंदा रचनाएँ हैं |भावपूर्ण पंक्ति"बिना पुस्तक का घर लगे
    बिना खिडकी का कक्ष "
    आशा

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