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Monday, 9 April 2012

फिफ्टी-फिफ्टी होय, चलाचल चक दे फ़ट्टे-

जन्म-दिन की शुभ-कामनाएं

नन्ही कली..

शिखा  वार्ष्णेय   
 
सौम्या सृष्टी सोहिनी, माँ की मंजिल राह ।
सचुतुर, सुखदा, सुघड़ई, दुर्गे मिली अथाह । 

 दुर्गे मिली अथाह, बड़ी आभारी माता ।
ताकूँ अपना अक्श, कृपा कर सदा विधाता ।

हसरत हर अरमान, सफल देखूं इस दृष्टी ।
मंगल-मंगल प्यार, लुटाती सौम्या सृष्टी ।।
पोर-पोर में प्यार है, ममता अंश असीम ।
दर्शन तुझमे ही करूँ, अपने राम रहीम । 

अखबारों का छपना देखा

 श्यामल सुमन 


सुमन सिखाये सच्ची चीज ।
खुश्बू  सींचे  अन्तर-बीज । 
काँटो को यह रास ना आये -
कुढ़न-कुबत कलही की खीज ।

गीत..........जो लिख न सकी.


 उन्माद लिखें अवसाद लिखें ।
कुछ पहले की, कुछ बाद लिखें ।
हर पल का एक हिसाब बने ,
कुछ भूली बिसरी याद लिखें ।। 
(केवल उत्कृष्ट कविता के लिए / नथिंग इल्स )


यूपी सरकार का काला सच ....

महेन्द्र श्रीवास्तव at बेसुरम्‌


चोट्टे चौगोषा लखें, चमचे चुप चुबलांय ।
चौगोषा मिष्ठान भर, चाट-चूट  के खांय ।

चाट-चूट के खांय, हरेरी सबके छावे ।
अफसरगन उकताँय, जान जोखिम में पावे। 
   
फिफ्टी-फिफ्टी होय, चलाचल चक दे फ़ट्टे ।
व्यर्थ हुवे बदनाम,  आज मौसेरे चोट्टे ।।

आधा सेर चाउर

वटवृक्ष

 अरविन्द मिश्रा
खबर आजतक पर चली, गली गली सी लाश ।
नक्सल-गढ़ थाने पड़ी, जिसकी रही तलाश ।।

उन्होंने घर बनाए - अज्ञेय

मनोज कुमार at राजभाषा हिंदी


खुद को खुद का ना पता, खुदा बूझता खूब ।
टुकुर टुकुर रविकर लखे,  गहरे ग्यानी डूब । 

जयजयकार बिल्लियों की ।

Sushil Kumar Joshi at "उल्लूक टाईम्स 


इच्छा कर ले नियंत्रित, मत जाना तू लेट ।
चूहों को देते अभय, उल्लू लेत लपेट । 

उल्लू लेत लपेट, आज-कल कम्बल ओढ़े ।
घी से भरते पेट, समझ न गलत निगोड़े ।

मिलते उल्लू ढेर, सोच की करो समीक्षा ।
अंधे हाथ बटेर, नहीं तो करती इच्छा ।।
 


4 comments:

  1. फिफ्टी-फिफ्टी होय, चलाचल चक दे फ़ट्टे ।
    व्यर्थ हुवे बदनाम, आज मौसेरे चोट्टे ।।
    वाह बहत खूब,लिखा आपने,.....

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  2. खुद को खुद का ना पता, खुदा बूझता खूब ।
    टुकुर टुकुर रविकर लखे, गहरे ग्यानी डूब ।
    और यही सच्चाई भी है रविकर जी,,, सुन्दर पंक्तियाँ .......

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  3. पोर-पोर में प्यार है, ममता अंश असीम ।
    दर्शन तुझमे ही करूँ, अपने राम रहीम ।
    खुद को खुद का ना पता, खुदा बूझता खूब ।
    टुकुर टुकुर रविकर लखे, गहरे ग्यानी डूब ।
    एक से बढ़के एक अनु -टिपण्णी ,मूल पे सूद भारी .

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