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Sunday, 27 May 2012

पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है

गंग-चन्द्र तन भस्म है, गले में डाला नाग |

गले में डाला नाग, हुए कैलाश निवासी |
मना रहे आनंद,बने है घट घट वासी |

पर शंकर परिवार, ठंड से कांप रहा है |
पड़ी जलानी आग, गणेशा ताप रहा है || 

              

आए तुम याद मुझे --जिंदगी के ३६ साल बाद --







महत्वपूर्ण है जिंदगी, घर के दर-दीवार |
छत्तीस से विछुड़े मगर, अब तिरसठ सट प्यार |


अब तिरसठ सट प्यार, शिला पर लिखी कहानी |
वह खिडकी संसार,दिखाए डगर जवानी |


आठ साल की ज्येष्ठ, मगर पहला था चक्कर |
चल नाले में डाल, सुझाता है यह रविकर ||

7 comments:

  1. बहुत बढि़या।

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  2. बहुत आभार रविकर जी !

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  3. आपकी इस उत्कृष्ठ प्रविष्टि की चर्चा कल मंगल वार 29/5/12 को राजेश कुमारी द्वारा चर्चा मंच पर की जायेगी |

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  4. बहुत बढ़िया.........

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  5. बहुत बढ़िया छंद साझा कियो हैं आपने।

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  6. क्या बात है
    यात्रा में भी
    पूरा कारोबार है।

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