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Sunday, 24 June 2012

घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम-

तारों की घर वापसी


तारे होते बेदखल, सूरज आँखे मूंद |
अद्वितीय अनुकल्पना, आंसू शबनम बूंद |

आंसू शबनम बूंद, सूर्य को तपना भाये |
किन्तु वियोगी चाँद, अकेला रह न पाए |

उतर धरा पर चाँद, इकट्ठा करे संभारे |
छूकर प्रभु के चरण, गगन पुनि चमकें तारे ||


कमल का तालाब

देवेन्द्र पाण्डेय 
स्थानः काशी हिंदू विश्व विद्यालय समयः 25-06-2012 की सुबह फोटूग्राफरः देवेन्द्र पाण्डेय।

कमल-कुमुदनी से पटा, पानी पानी काम ।
घोंघे करते मस्तियाँ, मीन चुकाती दाम ।

मीन चुकाती दाम, बिगाड़े काई कीचड़ 
रहे फिसलते रोज, काईंया पापी लीचड़ ।

किन्तु विदेही पात, नहीं संलिप्त  हो रहे ।
भौरे की बारात, पतंगे धैर्य खो  रहे ।।

ऋषभ देव शर्मा
ऋषभ उवाच  
साधुवाद शुभकामना, हे ! मन की दीवार ।
सुषमा सुश्री मुक्तकें, चाँद लगाते चार ।

चाँद लगाते चार, कहें प्रोफ़ेसर गोपी ।
कवि रविकर चालाक, भाव पर चाक़ू घोपी ।

बहुत बहुत आभार, ऋषभ जो हमें जोड़ते ।
प्रांत  हैदराबाद,  बड़ी  बंदिशें तोड़ते ।।

आप मुड़ कर न देखते

नीरज गोस्वामी  

धीरे से अपनी कहे, नीरज रविकर-मित्र |
चींखे-चिल्लायें नहीं, खींचे रुचिकर चित्र |


खींचे रुचिकर चित्र, पलट कर ताके कोई |
हालत होय विचित्र, राम-जी सिय की सोई |


पर मैं का मद आज, कलेजा हम का चीरे |
कभी रहा था नाज, भूलता धीरे धीरे || 

हवन का ...प्रयोजन.....!!

Anupama Tripathi
anupama's sukrity.  

 वाह वाह अनुपम हवन, किन्तु प्रयोजन भूल ।
 आँख धुवें से त्रस्त है, फिर भी झोंके धूल ।

फिर भी झोंके धूल , मूल में अहम् संभारे ।
सुकृति का शुभ फूल, व्यर्थ ही ॐ उचारे ।

अहम् जलाए अग्नि, तभी तो बात बनेगी ।
आत्मा की पुरजोर, ईश से सदा छनेगी ।। 

पी सी गोदियाल

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दुखद मार्मिक कष्टप्रद, दुर्घटना गंभीर |
पूँछों उन माँ बाप से, असहनीय यह पीर |


असहनीय यह पीर, चीर कर डिंगो खाए |
भोगी जोड़ी जेल, अंत निर्दोष कहाए |


यहाँ बोरवेल साल, गिराता  रहता बच्चा |
रहे खोद के डाल, दे रहे दोषी गच्चा ||

गम का सौदा कर चले, दामन में भर शूल |
दूजा भय से देखता, पर रविकर के फूल |

पर रविकर के फूल, मूल में याद तुम्हारी |
इन यादों में झूल, भूलता विपदा सारी |

रविकर रखे सहेज, प्यार की अमित-निशानी |
अमिट याद का तेज, पलट कर देखो रानी ||


  

9 comments:

  1. सुन्दर टिप्पणी से हमारी रचना का श्रृंगार करने का शुक्रिया रविकर जी.

    सादर
    अनु

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  2. अरे वाह प्रभु इसका तो हमें पता ही नहीं था...आपके इस प्रयास की प्रशंशा शब्दों में करना असंभव है...आप निश्चित रूप से विलक्षण हैं...साधू वाद स्वीकारें

    नीरज

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  3. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति ... आभार

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  4. gajab ki tippaniyan...Awesome !

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  5. हमेशा की तरह लाजवाब तरीके से ...

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  6. बहुत सुन्दर और भावपूर्ण |
    आशा

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  7. बहुत सुंदर प्रस्तुति।
    सादर।

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  8. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा आज बुधवार के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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