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Wednesday, 27 June 2012

धरा लूट के यूँ धरा, धनहर धूम धड़ाक

धरती तो पूरी लूट खाई हरामखोरों, जाकर गगन देखो !

पी.सी.गोदियाल "परचेत"
अंधड़ !  

शेर एक से एक है, प्रगट करूँ आभार |
सावधान हे पाठकों, बेहद पैनी धार || 
कुंडली  
 धरा लूट के यूँ धरा, धनहर धूम धड़ाक ।
सात समंदर पार कर, रहा आसमाँ ताक ।

रहा आसमाँ ताक , बसेगा अब मंगल पर ।
फितरत फिर नापाक, बड़ी है इसकी रविकर ।

शैतानी अरमान, बसाने को उद्दत सब ।
किया बड़ा नुक्सान, धरा पूरी आहत अब।
 मेरी भी सुन लो -

यशवन्त माथुर 
तुझको तो मैं लूँ बचा, मुझको कौन बचाय |
मैं भी बच जाऊं मगर, मारें गला दबाय |

मारें गला दबाय, दूध का बड़ा कठौता |
देंगे चटा अफीम, करे न ये समझौता |

काट रहे ये डाल, नहीं चेतें हैं अब तक |
रही इन्हें जो पाल, काटते उसका मस्तक ||

आधे संसार में कुछ पूरे दिन

sidheshwer
कर्मनाशा  

अंचल जी का शुक्रिया, देता शुभ आशीष ।
पर्वत घाटी नदी सर, इस अंचल के ईश ।
 
इस अंचल के ईश, चित्र बेहद खुबसूरत ।
यह आधा संसार, प्यार से भैया *घूरत ।  
 *घूमना
चौकोड़ी के मोड़, बहे पत्थर में पानी ।
शांत सुरम्य स्थान, हुई दुनिया दीवानी ।।  

Untitled

 Roshi at Roshi 

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डालो बोरा फर्श पर, रखो क्रोध को *तोप |
डीप-फ्रिजर में जलन को, शीतलता से लोप |
*ढककर
शीतलता से लोप, कलेजा बिलकुल ठंडा |
पर ईर्ष्या बदनाम, खाय ले मुर्गा-अंडा |

दो जुलाब का घोल, ठीक से इसे संभालो |
पाहून ये बेइमान, विदा जल्दी कर डालो ||

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 बढ़िया विश्लेषण करें, टिप्पणियों की आप |
चुन चुन कर देते यहाँ, इस ब्लॉग पर छाप |


इस ब्लॉग पर छाप,  चितेरे बड़ी बधाई |
बड़े महत्व की टीप, पोस्ट पर जितनी आई |


सब की सब हैं स्वर्ण, छाँट कर धरो अमोलक |
अनुकरणीय प्रयास, बजाओ ढम ढम ढोलक ||

हृदय का संस्कार

प्रतुल वशिष्ठ 
 दर्शन-प्राशन


वर्षों की संख्या तीन हुई, नित दीन-हीन अति-क्षीण हुई |
कल्पनी काट कल्पना गई, पर विरह-पत्र उत्तीर्ण हुई ||


कल पाना कैसे भूल गए, कलपाना चालू आज किया -
बेजार हजार दिनों से मैं, क्या प्रेम-प्रगाढ़ विदीर्ण हुई  ??

ब्लॉगर्स की दो कटौगरी -- भैया के लाल जियें

ZEAL
मुश्किल में मुस्काते जाते, बड़ा हौसला उत्साही |
कंटकाकीर्ण पथ पर बढ़ते, उदाहरण बढ़िया राही ||

रविकर की अपनी शैली, बुद्धि कम उपयोग करे-
सीधा सादा जीवन जीता , ढूँढ़ रहा इक हमराही ||

"विदाई"

Sushil 
"उल्लूक टाईम्स "
 बुलबुल चुलबुल दें दुआ, बाबुल का अंदाज |
शेर गीत भाषण पढ़ें, अंतिम दिन का ताज | 


अंतिम दिन का ताज, नाज फिर सभी उठाते |
तनिक लगे न लाज, गिफ्ट बढ़िया ले जाते |


देते वाहन साज, बदन भारी जो थुल-थुल |
चार जने का काज, करे फट बुलबुल चुलबुल ||



9 comments:

  1. सार्थक और सटीक

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  2. कल पाना कैसे भूल गए, कलपाना चालू आज किया -
    बेजार हजार दिनों से मैं, क्या प्रेम-प्रगाढ़ विदीर्ण हुई ??....

    गजब की पंक्तियाँ!... वाह क्या बात है सर जी।

    .

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  3. काट रहे ये डाल, नहीं चेतें हैं अब तक |
    रही इन्हें जो पाल, काटते उसका मस्तक ||
    कैसे ये निर्लज्ज मारते भावी माता ,भाषण में कहते हैं इसको भारत माता .......ओ माँ तेरी सूरत से अलग भगवान् की सूरत क्या होगी ?

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  4. आपको किसने बताया गिफ्ट के बारे में?

    आभार !

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    Replies
    1. विदा किया जिस व्यक्ति को, उसका नंबर पास |
      सठियाया है तभी तो, कर बैठा बकवास ||

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  5. बहुत अच्छी प्रस्तुति!

    इस प्रविष्टी की चर्चा शुक्रवारीय के चर्चा मंच पर भी होगी!

    सूचनार्थ!

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