Follow by Email

Sunday, 1 July 2012

करते प्रतिदिन ढोंग, पडोसी बड़े हितैषी-

भीड़ बढ़ी है बाजारों में

  अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
 भीड़ बढ़ी है बाजारों में, यार जरा सा आ जाना |
गम खाया है बहुत दिनों तक, इक मुस्कान खिला जाना |

मंहगाई बेजार किये जब, तू विरह गीत बेजा गाई-

दूरभाष बेतार किये पर , तार तार अरमान मिटाई-
पिछली मुलाक़ात मंहगी अति, सालों ने क्या करी धुलाई -
नजर बचा आ मन्दिर पीछे, घूम रहे हैं वो दंगाई -

सावन भी प्यासा का प्यासा, मन-मयूर हरसा जाना |

गम खाया है बहुत दिनों तक, इक मुस्कान खिला जाना ||



 "योगी लोग"

Sushil

बुद्धि बिलासी शहर में, विलासिता का रोग |
कूड़ा पानी प्रवृत्तियां, धर्म  निभाएं  लोग |

धर्म  निभाएं  लोग, भोग की आदत ऐसी |
करते प्रतिदिन ढोंग, पडोसी बड़े हितैषी  |

अल्मोड़ा के बोल, भरे हैं जगत-उदासी |
बदल गया भूगोल, धन्य हैं  बुद्धि-विलासी ||

-:चाय:-

dheerendra 
चाय वाय करवा रही, चांय-चांय हर रोज |
सुबह सुबह तो ठीक है, दिन में  बारह डोज |

दिन में  बारह डोज, खोज अब दूजी लीजै |
यह मित्रों की फौज, नवाजी बाहर कीजै |

हुई एक दिन शाम, मिले व्यवहारी आला |
इंतजाम छ: जाम, हुआ अंजाम निराला ||


प्यार का नाम लेना , अब अच्छा नहीं लगता ...

छीके अब मुंह खोल के, कै मीठे-पकवान । 
जगह-जगह खाता रहा, कम्बल ओढ़ उतान।

 कम्बल ओढ़ उतान, तपन की आदत डाले ।
रहा बहुत मस्तान, आज मधुमेह सँभाले ।

उच्च दाब पकवान,  करे अब Point फ़ीके ।
 बदल गया इंसान, खोल  में बैठा छींके ।।   

कोल्हू के बैलों का पत्र एन बी टी संपादक के नाम

कमल कुमार सिंह (नारद ) at नारद
बिना बुलाये बहकता, गोबर करके जाय |
हुआ मार का हक़ ख़तम, बैल नधा अकुलाय |

बैल नधा अकुलाय, हुआ  था  बधिया पहले |
कोल्हू-रहट चलाय, कलेजा अब तो  दहले |

बैल मुझे आ मार, नहीं तेली बोलेगा  |
जब तक करे बेगार, पगहिया ना खोलेगा ||
 

12 comments:

  1. sir ji ye bhi kamal hai ....jarur padhuga ........

    ReplyDelete
  2. आभार,,,,रविकर जी,

    ReplyDelete
  3. क्या बात है!!
    आपकी यह ख़ूबसूरत प्रविष्टि कल दिनांक 02-07-2012 को सोमवारीय चर्चामंच-928 पर लिंक की जा रही है। सादर सूचनार्थ

    ReplyDelete
  4. भीड़ बढ़ी है बाजारों में
    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    भीड़ बढ़ी है बाजारों में, यार जरा सा आ जाना |
    गम खाया है बहुत दिनों तक, इक मुस्कान खिला जाना |
    भीड़ बढ़ी है बाजारों में
    अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
    भीड़ बढ़ी है बाजारों में, यार जरा सा आ जाना |
    गम खाया है बहुत दिनों तक, इक मुस्कान खिला जाना | बहुत बढ़िया प्रस्तुति .. .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai

    रविवार, 1 जुलाई 2012
    कैसे होय भीति में प्रसव गोसाईं ?

    डरा सो मरा
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

    ReplyDelete
  5. सावन भी प्यासा का प्यासा, मन-मयूर हरसा जाना |
    गम खाया है बहुत दिनों तक, इक मुस्कान खिला जाना ||
    .. .बहुत सुन्दर है . बहुत बढ़िया प्रस्तुति .. .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai

    रविवार, 1 जुलाई 2012
    कैसे होय भीति में प्रसव गोसाईं ?

    डरा सो मरा
    http://veerubhai1947.blogspot.com/

    ReplyDelete
  6. बहुत सुन्दर कवी वर, आपकी टिप्पणिय भी आपकी कवितावो के तरह दिलचस्प और सुन्दर होती है :) आभार

    ReplyDelete
  7. शानदार टिप्प्णी जानदार रसगुल्ला
    पानी वाले दूध पर मलाई जमा दे बिल्ला ।

    ReplyDelete
  8. रोज पड़ोसी पूजिये,ढोंग करे या प्यार
    मांगे कोई चीज तो मत कीजे इनकार
    मत कीजे इनकार,चाय-पत्ती या शक्कर
    लेन देन से ही बढ़ता है प्रेम परस्पर
    देख सहजता नाम आपका बहुत गुनेगा
    वरना इस युग रवि कविता कौन सुनेगा ?

    क्षमा याचना सहित.....

    ReplyDelete