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Saturday, 7 July 2012

मात-पिता का दूर से, करे पुत्र उद्धार -

Untitled

Kamleshwar pd singh
manav
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धार तीव्रतर भाव की, बही शब्द की धार |
मात-पिता का दूर से, करे पुत्र उद्धार ||


"दोहा पच्चीसी" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

दोहे चर्चा मंच से, चोरी हुवे पचीस ।
दर्ज करता हूँ रपट,  दोहे बड़े नफीस ।
दोहे बड़े नफीस, यहाँ न फीस दे गया ।
शामिल धीर-सुशील, छोड़ते हैं शरम - हया ।
रविकर करे अपील, मिले दोहा पच्चीसी ।
 मत  दे देना ढील, काढ़ कर पढ़िए खीसी ।।


"शनिवार की चर्चा-दोहों की भरमार" (चर्चा मंच-933)

किया आदि से अंत तक, धांसू  ठोस कमेन्ट ।
प्रोफ़ेसर चिपके गजब, अम्बुजा सीमेंट ।
अम्बुजा सीमेंट, धीर भी गजब दिखाया ।
लगातार दो दिवस, यहाँ फिफ्टी बनवाया ।
जोड़ी जुगल जमाय, रही है जमकर चर्चा ।
पर्चा चेकर सुशील, धीर दे पूरा खर्चा ।।

डाक्टर दिव्या दे रही, इक डाक्टर को डोज ।
दो दिन का राशन मिला, कर उल्लू तू मौज ।।

श्रेष्ठ टिप्पणी कर गए, मित्र बुजुर्ग अशोक ।
बच्चों की गलतियों पर, अवश्य दीजिये टोक ।।

सभी टिप्पणी कार हैं, धन्यवाद के पात्र ।
ये सब की सब तोप हैं, नहीं टिप्पणी मात्र ।

6 comments:

  1. बहुत सुन्दर..

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  2. आभार ,,,रविकर जी

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  3. फिर से एटम बम गिराया,दुश्मन होंगे ढेर |
    रवि के आगे टिक सका है कब तक अंधेर ?

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  4. आपके इस ब्लोग के पोस्ट का कायल तो रहा ही हूं, आजकल तो वैसे भी यह अंतर(ब्लोगीय़)राष्ट्रीय प्रसिद्धि पा रहा है।

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  5. सभी टिप्पणी कार हैं, धन्यवाद के पात्र ।
    ये सब की सब तोप हैं, नहीं टिप्पणी मात्र ।

    क्या बात है रविकर जी.

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