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Thursday, 19 July 2012

ऐ लोढ़े तू रूठ के, भाँड़ रहा है गेम -


सिलवट पर पिसता रहा, याद वाद रस प्रेम ।
 ऐ लोढ़े तू रूठ के,  भाँड़  रहा है गेम ।

 भाँड़ रहा है गेम, नेम शाश्वत अब टूटे ।
वासर ज्यूँ अखरोट,  नहीं तेरे बिन फूटे ।

पाता था नित चैन, लुढ़क जो बदले करवट ।
बिन तेरे दिन रैन, तड़पता रहता सिलवट ।।



कब भीगता हूँ 'अकेला'

शिवनाथ कुमार
मन का पंछी


मन का पंछी दूर तक, उड़ उड़ वापस आय ।
सावन की मनहर छटा, फिर भी मन तड़पाय ।

फिर भी मन तड़पाय, साथ यादें ही आती ।
सुन लो तुम चितलाय, झूल सावन जो गाती ।

भीगे भीगे शब्द, करे हैं ठेलिमठेला ।
रहा अधर में झूल, भीगता नहीं अकेला ।।
""बहुत है झूलने वाले "'


मेरे गांव की शाम

lokendra singh rajput
अपना पंचू  
 
सकारात्मक सोच का, प्रगटीकरण सटीक ।
गाँव आज भी बढ़ रहे, पकड़ सभ्यता लीक ।

पकड़ सभ्यता लीक, नियत में भलमनसाहत ।
भाई चारा ठीक, सदा खुशहाली चाहत ।

किन्तु जरूरत आज, सही सरकारी नीती ।
भ्रष्टाचारी बाज, छोड़ ना पाता रीती ।।




खुदा भी आसमाँ से जब ज़मी पर देखता होगा....

ZEAL at ZEAL -
खड़ी खुदाई मंत्रमुग्ध, सकल देवगण व्योम ।
एक बार दिल्ली तकें, ताक रहे फिर रोम ।

ताक रहे फिर रोम, सकल कुल नेहरु गाँधी ।
ब्रह्मलोक हथियाय,  नियन्ता बुद्धि बाँधी ।

किंकर्तव्यविमूढ़ , देव गौड़ा की नाई ।
आँख मूंद मन मौन,  नशे में खड़ी खुदाई ।।




व्‍यंग्‍य का शून्‍यकाल


व्यंग काल के शून्य सम, ना  मौनी सम्मोह |
इक करता कल्याण-जन, दो करता जन द्रोह ||


"मान भी जाया कर इतना मत पकाया कर "


लम्बे लम्बे फेंकते, लम्बी लम्बी भाँज ।
आज उन्हीं को खल गई, शिकायती अंदाज ।

शिकायती अंदाज, करे सब वायदे लम्बे ।
बिजली गुल हो जाय, दीखते लम्बे खम्बे ।

मलिका लम्बी भली,  खले पर  कविता लम्बी।
लम्बे से बीमार, खाइए छिली मुसम्बी ।।


10 comments:

  1. वाह .. बेहतरीन प्रस्‍तुति।

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  2. हमेशा की तरह
    उम्दा और लजीज
    दिल अजीज !

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  3. बहुत सुन्दर रविकर जी..
    एज़ आल्वेस :-)

    सादर
    अनु

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  4. बेहद खूबसूरत ,बहुत बढ़िया प्रस्तुति!आभार .
    सादर
    आपका सवाई
    ऐसे नबंरो पर कॉल ना करे. पढ़ें और शेयर

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  5. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!आभार .

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  6. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (21-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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  7. मोहन भैया अपना अब पूडल कहलाय ,

    बलिहारी उस रोम की जिन पूडल लियो अपने ,गोद में बिठाय खड़ी खुदाई मंत्रमुग्ध, सकल देवगण व्योम ।
    एक बार दिल्ली तकें, ताक रहे फिर रोम ।

    ताक रहे फिर रोम, सकल कुल नेहरु गाँधी ।
    ब्रह्मलोक हथियाय, नियन्ता बुद्धि बाँधी ।पूडल अपना भैया विदेशों में कहलाय ...इस पर लिखो रविकर भाय .कृपया यहाँ भी पधारें -
    ram ram bhai
    शुक्रवार, 20 जुलाई 2012
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?
    क्या फर्क है खाद्य को इस्ट्यु ,पोच और ग्रिल करने में ?


    कौन सा तरीका सेहत के हिसाब से उत्तम है ?
    http://veerubhai1947.blogspot.de/
    जिसने लास वेगास नहीं देखा
    जिसने लास वेगास नहीं देखा

    http://kabirakhadabazarmein.blogspot.com/

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  8. सुंदर लिंकों का संयोजन
    सादर आभार !!

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  9. रविकर के हाथ लग गया
    किसी जिन्न का चराग
    घिसता चला जा रहा है
    पैन लगता है लिखती
    जा रही है उसके लिये
    सब कुछ अपने आप !!

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  10. सुशील जी , मेरे हाथ में होता तो रविकर जी को, साहित्य का सर्वश्रेष्ठ पुरस्कार देती। ऐसी विलक्षण प्रतिभा हर किसी के पास नहीं होती।

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