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Thursday, 9 August 2012

हर शहीद गांधी मिला, शेष सभी हैं गौण-


ये भगतसींह कौन है बे ? "आर टी आई" ने खोली पोल

SACCHAI
AAWAZ  

अबे भगत सिंह कौन है,  आर टी आई मौन ।
हर शहीद गांधी मिला, शेष सभी हैं  गौण |

शेष सभी हैं गौण, गुरु अफजल को जाने |
है कसाब मेहमान, आज के बड़े सयाने |

कर जमीन का दान, बांग्ला देश मुकम्मल |
भारत में घुसपैठ, बनाये ढाका मलमल ||


बइले को मोबाइलें, दे दे के बहलाय |
मौंजीबंधन दें करा, पंडित बड़ा बुलाय |
पंडित बड़ा बुलाय, दक्षिणा तीस रुपैया |
महीने में इक बार, हेलो कर लेना सैंया |
रविकर बेंच जुगाड़, ख़रीदे दाना-पानी |
राहुल मौका ताड़, पकड़ लेता बेईमानी ||

Sushil Kumar Shinde apologises for 'filmy' dig at Jaya Bachchan in ...

सुन सुशील सन्देश, मांगते माफ़ी शिंदे-

फ़िल्मी दंगे क़त्ल सम, समझ असम का केस |
है सशक्त यह पटकथा, सुन सुशील सन्देश |
सुन सुशील सन्देश, मांगते माफ़ी शिंदे |
सेंसर करता बोर्ड, सीन काटे सब गंदे |
 
 रही खड़ी चुपचाप, मरे शोले में  घर-भर |
अपना रस्ता नाप, अरे फ़िल्मी घन चक्कर || 

समझी झट इस बार, तभी तो फट गुस्साई-


समारोह दीक्षांत में, दिग्गी राजा आय |
हिंदी-डिग्री सौंपते, पाय सोनिया माय |
पाय सोनिया माय, थैंक्यू कह शरमाये |
वो संसद जब जाय, समझ में चर्चा आये |
अडवानी की बंद,  करे इक दिवस बोलती |
गुस्से का इजहार, जुबाँ इस कदर खोलती |


इत्ता गुस्सा बाप रे, अडवानी की भूल |
यू पी ए टू कह गए, दे दी जम के तूल |
दे दी जम के तूल, मीडिया समझ न पाया |
रविकर ने इस बार, उसे ऐसे समझाया |
हिंदी भाषा ज्ञान,  ख़तम की पूर्ण पढ़ाई |
 समझी झट इस बार,  तभी तो फट गुस्साई ||

6 comments:

  1. हिंदी दीक्षित होने पर ग्रेजुएशन सेरीमनी करवाओ ,
    असम यू पी ए टू ,अवैध हैं जन जन को समझाओ ,
    अडवानी सच बोलेंगे .

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    Replies
    1. समारोह दीक्षांत में, दिग्गी राजा आय |
      हिंदी-डिग्री सौंपते, पाय सोनिया माय |
      पाय सोनिया माय, थैंक्यू कह शरमाये |
      वो संसद जब जाय, समझ में चर्चा आये |
      अडवानी की बंद, करे इक दिवस बोलती |
      गुस्से का इजहार, जुबाँ इस कदर खोलती |

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  2. बहुत अच्छे व्यंगबाण !!

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  3. .बहुत सार्थक प्रस्तुति .श्री कृष्ण जन्माष्टमी की आपको बहुत बहुत शुभकामनायें . ऑनर किलिंग:सजा-ए-मौत की दरकार नहीं

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  4. अरे बाप रे बाप!
    आपके तीखे व्यंग्य वाणों का भी जबाब नही रविकर जी.
    घुसकर फिर निकलने का नाम न लें.

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