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Friday, 21 September 2012

जूं रेंगे न कान पर, सत्ता बेहद शख्त-




भारत बंद रखने के पीछे क्या सोच है !!

 मरते मरते मर मिटे, अनशन अन्ना भक्त ।
जूं रेंगे न कान पर, सत्ता बेहद शख्त ।

सत्ता बेहद शख्त, बंद से क्या होना है ।
पब्लिक कई करोड़, चादरों में सोना है ।

पर दैनिक मजदूर, बताओ क्या हैं करते ?
रोगी जो गंभीर, कहो जीते या मरते ।।


भगवान् राम की सहोदरा (बहन) : भगवती शांता परम-16

सर्ग-4
भाग-4 

अंग-देश में अकाल     

Shanta (Ramayana)

Shanta is a character in the Ramayana. She was the daughter of Dasharatha and Kausalya, adopted by the couple Rompad and Vershini.[1] Shanta was a wife of Rishyasringa.[1] The descendants of Shanta and Rishyasringa are Sengar Rajputs who are called the only Rishivanshi rajputs.

Life

Shanta was a daughter of Maharajah Dasharatha and Kausalya, but was adopted by the king (rajah) of Angadesh, Raja Rompad, and her aunt Vershini, an elder sister of Kausalya. Vershini had no children, and, when at Ayodhya, Vershini jokingly asked for offspring. Dasharatha agreed to allow the adoption of his daughter. However, the word of Raghukul was binding, and Shanta became the princess of Angadesh.
Shanta was educated in Vedas, Art and Craft, and was considered to have been very beautiful. One day, while her uncle, the king Rompad, was busy in conversation with Shanta, a Brahmin came to ask for help in cultivation in the days of the monsoon. Rompad did not pay attention to the Brahmin's plight. This irritated and enraged the Brahmin, who left the kingdom. Indradev, the god of rain, was unable to bear the insult of his devotee, so there was little rainfall during the monsoon season. The Rajah called Rishyasringa to perform yagya, he agreed to perform yagya and during the recitation of it, it rained heavily. The public rejoiced and there were festivals in Angadesh. To pay honour to their saviour, Dashratha, along with Kausalya, Vershini, and Rompad, decided to give the hand of Shanta to Rishyasringa.

ख़बरें सेहत की

Virendra Kumar Sharma  
बचपन में लो बूस्टर, पियो एनर्जी ड्रिंक ।
फास्ट फ़ूड लो टिफिन में, भर लो काली इंक ।
भर लो काली इंक, लिखेगा काला काला ।
कई तरह के लिंक, निकाले देह-दिवाला । 
कामोत्तेजक ड्रग्स, करो उत्तेजित पचपन ।
झेले कहाँ शरीर, बुढापे तक रे *बचपन ।।
*बचपना

आवश्यकता है एक " पोस्टर ब्वाय " की !

महेन्द्र श्रीवास्तव  
आधा प्लस आधा हुआ, पूरा पूरा सत्य |
ठगे हुवे हम हैं खड़े, देखें काले कृत्य |
देखें काले कृत्य , छंद गंदे हो जाते |
कुक्कुरमुत्ते उगे, मगर क्या बहला पाते ?
जगना हुआ हराम, भला था सोये रहते |
देखा मुंह में राम, छुरी को कैंची कहते ||

 कुछ दिन में वह आयेगा, लेकर बर्तन ख़ास |
लेगा रूपये पांच सौ, एहसान-ए-अहसास |
एहसान-ए-अहसास, ख़ुशी से आप दीजिये |
एक लाटरी टिकट, रसीदें साथ लीजिये |
चीजे मिलती मुफ्त, समस्या भी लाती हैं |
बेंचेगा सामान, कम्पनी सिखलाती है ||

चिंतन ...

सदा 
सहमत होने पर हिले, जब हल्का सा शीश ।
हुवे असहमत तो भले, क्यूँ जाते हो रीश ?
क्यूँ जाते हो रीश, पटकते बम क्यूँ भाई ?
पटक रहे अति विकट, पड़े क्या उन्हें सुनाई ?
प्रकट करो निज भाव, कहो ना बुरा भला कुछ  ।
सीखो संयम धैर्य, गया ना कहीं चला कुछ ।

दीदी-दादा तानते, कुर्सी वो मजबूत ।
भैया-बहना बांधते, मोहन रक्षा-सूत्र ।
मोहन रक्षा-सूत्र, सकल यू पी भरमाया ।
जीवन भर बंगाल,  कहीं मुंबई  कमाया ।
एफ़ डी आई, तेल, सिलिंडर काटे कौवा ।
साम्प्रदायिक संघ, हुआ हिंदू ही हौव्वा ।


भागें भगवन भक्त से, भड़भूजे से अन्न |
फास्ट फूड की फेहरिश्त, फिर फांके संपन्न |

फिर फांके संपन्न, नहीं ईश्वर से डरते |
बड़ा चढ़ावा भेंट, देख शिर्डी में करते |

रोटी से मजबूर, गरीबी क्या खाएगी |
हांड़-मांस को बेंच, अश्रु ही पी पाएगी ||



9 comments:

  1. बहुत बढिया।

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  2. अपना देश बचाएं कैसे,अंधे,बहरे कैसे लोग |
    अपनी करनी का फल कड़वा,आंसू बहा केभोगें लोग ||
    'माल हज़म कर लें हम कैसे,किसका कितना कहाँ कहाँ!'
    कुछ ऊंचे ओहदे वाले भी, लार गिरा कर सूंघें लोग ||

    ReplyDelete
  3. अपना देश बचाएं कैसे,अंधे,बहरे गूँगे लोग |
    अपनी करनी का फल कड़वा,आंसू बहा केभोगें लोग ||
    'माल हज़म कर लें हम कैसे,किसका कितना कहाँ कहाँ!'
    कुछ ऊंचे ओहदे वाले भी, लार गिरा कर सूंघें लोग ||

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  4. अपना देश बचाएं कैसे,अंधे,बहरे गूँगे लोग |
    अपनी करनी का फल कड़वा,आंसू बहा केभोगें लोग ||
    'माल हज़म कर लें हम कैसे,किसका कितना कहाँ कहाँ!'
    कुछ ऊंचे ओहदे वाले भी, लार गिरा कर सूंघें लोग ||

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  5. मेरे लिए यह सौभाग्य कि बात है कि मेरे लेख को लिंक लिखाड़ पर जगह मिली है वाकई उत्कृष्ट रचनाएं आपने एक जगह जमा की है इसके लिए आपका धन्यवाद !!

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  6. रविकर का अंदाज
    हमेशा गजब ढाता है
    कुछ भी लिख
    ले जाइये
    चार चाँद आकर
    वो लगाता है
    जब प्यार से वो
    उस पर टिपियाता है !

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  7. माँ एक अहसास !


    माँ एक भाव एक अहसास है, वह अपने अंश से आत्मा से जुड़ी उसकी हर सांस से जुड़ी जैसे गर्भ में रखते समय उसके हर करवट और हर धड़कन को सुनकर कितना उत्साहित होती है। फिर जिसे जन्म देती है , तो सीने से लगा कर उसकी गर्माहट से अपने गर्भकाल की और प्रसव पीड़ा को भूल…

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  8. यह हमारे दौर की एक बड़ी विडम्बना है कि अब बंद करवाने वालों और उसमें शिरकत करके रेल की पटरी उखाड़ने ,पटरियों पर भैंस से जुगाली करवाने वालों ,बसों और इतर देश की पहले ही उन चीज़ों को जिनकी इस देश में कमी है आग के हवाले करने वालों को अराष्ट्रीय कहने में तकलीफ नहीं होती है .ये सरासर हुडदंगी है .विरोध नहीं है हिंसात्मक विरोध है .सत्या ग्रह का यह मतलब तो नहीं था .विरोध प्रतीकात्मक होता है .एक दिन का उपवास करो देश का अन्न बचाओ .बिजली बचाओ

    ram ram bhai
    शनिवार, 22 सितम्बर 2012
    क्या फालिज के दौरे (पक्षाघात या स्ट्रोक ,ब्रेन अटेक ) की दवाएं स्टेन्ट से बेहतर विकल्प हैं

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  9. भाई रविकर जी! पोस्ट लिंक करने के लिए शुक्रिया. मैंने गद्य में जो बात कही उसे आपने पद्य में और बेहतर तरीके से कह दी.

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