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Friday, 28 September 2012

पाता जीवन श्रेष्ठ, लगा सुत पाठ-पढ़ाने-





पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |
पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

जब  पादप की बढ़ी उंचाई, पर्वत ईर्ष्या से कुढ़ जाता -
टांग अड़ाने लगा रोज ही, काली जिभ्या बकती गाली |


सर्ग-4
भाग-6  
 शांता-सृंगी विवाह 

पहले फेरे के वचन,  पालन-पोषण खाद्य |
संगच्छध्वम बोलते, बाजे मंगल वाद्य ||

स्वस्थ और सामृद्ध हो, त्रि-आयामी स्वास्थ |
भौतिक तन अध्यात्म मन, मिले मानसिक आथ ||

धन-दौलत या शक्ति हो, ख़ुशी मिले या दर्द |
भोगे मिलकर संग में, दोनों औरत-मर्द ||

Untitled

Vaanbhatt 
 वापस आने के लिए, नहीं निकलते बुद्ध ।
मात-पिता फिर भी करें, कोशिश परम विशुद्ध ।
कोशिश परम विशुद्ध, सकल सुविधा दिलवाते ।
 करें भागीरथ यत्न, ज्ञान की गंगा लाते ।
पाता जीवन श्रेष्ठ, लगा सुत पाठ-पढ़ाने ।
परदेशी व्यवहार, नहीं अब वापस आने ।

बच्चों की खिलती मुस्कान

  (प्रवीण पाण्डेय) 
 न दैन्यं न पलायनम्
अपनी किस्मत से दुनिया में, कई अधूरे चित्र मिलें हैं ।
ऊपर वाले की रहमत से, कुछ कलियाँ कुछ तनिक खिले हैं।
अपनी मेधा अपनी इच्छा, चाहे जो व्यवहार करूँ -
किन्तु पूर्णता देनी होगी,  मनभावन शुभ रंग भरूँ ।।

 
My Image
शीश घुटाले प्यार से, टोपी दे पहनाय |
गुलछर्रे के वास्ते, लेते टूर बनाय |
लेते टूर बनाय, काण्ड कांडा से करते |
चूना रहे लगाय, नहीं ईश्वर से डरते |
सात हजारी थाल, करोड़ों यात्रा भत्ता |
मौज करें अलमस्त, बाप की प्यारी सत्ता ||

 मनोरमा
मुद्दों ने ऐसा भटकाया,  हुआ शहर वीरान ।
मुर्दे कब्ज़ा करें घरों पर, भरे घड़े श्मशान ।
एक व्यवस्था चले सही से, लाशों पर है टैक्स -
अपना बोरिया बिस्तर लेकर, भाग गए भगवान् ।।

 उन्नयन (UNNAYANA) 

स्वाभिमान अभिमान अब, दया दृष्टि में खोट |
अपने ही पहुंचा रहे, भारत माँ को चोट ||


My Image
जिसकी कालर व्हाइट व्हाइट, चीं चीं चीं चीं कालर ट्यून ।
जिसको संदेसा देता हो, उगता सूरज, डूबा मून  ।
कदम कदम जो चले संभल कर, नेचर से है नेचर प्रेमी 
भेज रहे क्यूँ एस एम् एस हो, गुड नाइट को करते रयून ।।

चलो उधर अब चल दो ।
रस्ता जरा  बदल दो ।।

 दुनिया के मसलों का 
हिन्दुस्तानी हल दो ।।

 होली होने को हो ली 
रंग तो फिर भी मल दो ।

7 comments:


  1. पौधा रोपा परम-प्रेम का, पल-पल पौ पसरे पाताली |
    पौ बारह काया की होती, लगी झूमने डाली डाली |

    गीतात्मकता से संसिक्त है यह वेश रचना का .आनुप्रासिक शब्द सौन्दर्य लुभाता है .गति ताल माधुर्य सबकी अन्विति एक साथ होती है .

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  2. बहुत ही अच्‍छी प्रस्‍तुति।

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  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    आपकी इस उत्कृष्ट प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (30-09-2012) के चर्चा मंच पर भी की गई है!
    सूचनार्थ!

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