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Wednesday, 19 September 2012

रविकर गिरगिट एक से, दोनों बदलें रंग-



 सियानी गोठ

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) 

 रविकर गिरगिट एक से, दोनों बदलें रंग |
रहे गुलाबी खिला सा, हो सफ़ेद हो दंग |
हो सफ़ेद हो दंग, रचे रचना गड़बड़ सी |
झड़े हरेरी सकल, तनिक जो बहसा बहसी |
कभी क्रोध से लाल, कभी पीला हो डरकर |
बुरा है इसका हाल, घोर काला मन रविकर ||


माँ के गर्भाशय का बेटियों में सफल प्रत्यारोपण

Virendra Kumar Sharma  

  कहते हम हरदम रहे, महिमा-मातु अनूप ।
पावन नारी का यही, सबसे पावन रूप ।
सबसे पावन रूप, सदा मानव आभारी ।
जय जय जय विज्ञान, दूर कर दी बीमारी ।
गर्भाशय प्रतिरोप, देख ममता रस बहते ।
माँ बनकर हो पूर्ण, जन्म नारी का कहते ।।


कुछ आंसू घडियाली से

 डाली दुनिया पर नजर, होती जलकर कोल |
खाली गाली दे रहे, खोल सके ना पोल |
खोल सके ना पोल, दुश्मनी करें प्यार से |
ममता को एहसास, बने नहिं काम रार से |
रहा भरोसा डोल, चाल यह देखी भाली |
बढ़ा मुलायम रोल, नजर माया ने डाली ||

आज के व्यंजन

kush  

सोते कवि को दे जगा, गैस सिलिंडर आज ।
असम जला, बादल फटा, गरजा बरसा राज ।
गरजा बरसा राज, फैसला पर सरकारी ।
मार पेट पर लात, करे हम से गद्दारी ।
कवि "कुश" जाते जाग, पुत्र रविकर के प्यारे ।
ईश्वर बिन अब कौन,  यहाँ हालात सुधारे ।।



Untitled

कविता विकास  
काव्य वाटिका

मस्त मस्त है गजल यह ,  किसका कहें कमाल ।
 खुश्बू जो पाई जरा,  हुवे गुलाबी गाल  ।
हुवे गुलाबी गाल,  दिखे  प्यारे गोपाला ।
 काले  काले श्याम,  मुझे अपने में ढाला ।
बहुरुपिया चालाक,  शाम यह अस्तव्यस्त  है ।
वो तो  राधा संग,  दीखता  बड़ा  मस्त  है ।।



गधे का गाना (काव्य-कथा)

Kailash Sharma 

अपनी अच्छी आदत पर भी, समय जगह माहौल देखकर |
इस्तेमाल अकल का करके, अंकुश लगा दबाना बेहतर |
कथा गधे की यही सिखाये, यही कहे चालाक लोमड़ी-
जो भी ऐसा नहीं करेगा, गधा बनेगा गा-कर पिटकर ||

भारत भारत खुला.


 खुला खुला भारत खुला, धुला धुला पथ पाय |
ईस्ट-वेस्ट इण्डिया में, सब का मन हरसाय |
सब का मन हरसाय, आय के चाय पिलाओ |
डबल-रोटियां खाय, हुकूमत के गुण गाओ |
बंद हमेशा बंद, कंद के पड़ते लाले |
गोरे लाले मस्त, रो रहे लाले काले ||


क्या ब्लॉग जगत के नारी वादियों की वाद प्रियता शून्य हो चली है?

  क्वचिदन्यतोSपि...
बढ़िया घटिया पर बहस, बढ़िया जाए हार |
घटिया पहने हार को, छाती रहा उभार |

छाती रहा उभार, दूर की लाया कौड़ी  |
करे सटीक प्रहार, दलीले भौड़ी भौड़ी |

तर्कशास्त्र की जीत, हारता मूर्ख गड़रिया |
बढ़िया बढ़िया किन्तु, तर्क से हारे बढ़िया ||

मौका बढ़िया ताड़ के, नेहरु लेते साध |
नेता जी से हो गया, शुद्ध युद्ध अपराध |
शुद्ध युद्ध अपराध, भेज कर चिट्ठा बरसे |
सहा सोवियत रूस, सभी गोरे थे हरसे |
बना ब्रिटिश अभिलेख, आज रविकर नहिं चौका |
नेहरु का कश्मीर, गालियों का है मौका ||

7 comments:

  1. बहुत बढिया।

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  2. पिसकर पाती रंग ज्यों ,लाल मेंहदी रंग
    गिरगिट सा बदलो नहीं,रंग समय के संग
    रंग समय के संग , बनो मत अवसरवादी
    लाज राखिये श्वेत - रंग की होती खादी
    श्याम रंग में डूब,माथ पर चंदन घिसकर
    सीख ! मेंहदी लाल -रंग पाती है पिसकर ||

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  3. बहुत बढ़िया बेहतरीन चर्चा ...!!
    आभार .

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  4. बहुत बढ़िया बेहतरीन रविकर सर !!!!!!

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  5. माननीय श्री देवेन्द्र गौतम जी और श्री रविकर जी के प्रयास से " गंगा-दामोदर ब्लॉगर्स एसोसियेशन " के शुरुवात की पहल की गयी । यह बहुत ही सराहनीय कदम होगा तथा साहित्य प्रेमी इससे लाभान्वित होंगे । आशा है जल्द से जल्द इस एसोसियेशन के गठन के लिए मित्र - बंधु आगे आयेंगे । -- शुभ आकांक्षी (कविता विकास)

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