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Tuesday, 30 October 2012

पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली-

 दूध मांसाहार है, अंडा शाकाहार ।
भ्रष्ट-बुद्धि की बतकही, ममता का सहकार ।
ममता का सहकार, रुदन शिशु का अपराधिक ।
माता हटकु पसीज, छद्म गौ-बछड़े माफिक ।
पिला रही निज रक्त, मदर-विदुषी यह बोली ।
युगों युगों की खोज, बड़ी शिद्दत से खोली ।।



कामी क्रोधी लालची, पाये बाह्य उपाय ।
उद्दीपक के तेज से, इधर उधर बह जाय ।
इधर उधर बह जाय, कुकर्मों में फंस जाता  ।
अहंकार का दोष, मगर अंतर से आता।
हैं फॉलोवर ढेर, चेत हे ब्लॉगर नामी ।
पद मद में हो चूर, बने नहिं क्रोधी कामी ।।


 काव्य मंजूषा
 मांसाहारी सकल जग, खाता पशु प्रोडक्ट ।
कुछ देशों में व्यर्थ ही, लागू उल्टा एक्ट ।

लागू उल्टा एक्ट, *कपूतों खून पिया है ।

हाड़-मांस खा गए, कहाँ फिर भेज दिया है ।

फिर से माँ को ढूँढ, दूध की चुका उधारी ।

**मथुरा में जा देख, नोचते मांसाहारी ।। 
*माँ की ओर संकेत करने की कोशिश  
**विधवा आश्रमों के लिए भी  जानी जाती है मथुरा नगरी 
जहाँ एक रोटी के लिए दिन भर कीर्तन  करती हैं माताएं-
क्रियाकर्म टुकड़ों में काट कर किया जाता  है- 

  1. जब एनीमल प्रोडक्ट खाने से नहीं कोई गुरेज़
    फिर गुड खावें गुल्गुल्ले से कहते करो परहेज़
    कितनी दवाओं में होता है, नीरीह एनिमल पार्ट
    आदि काल से आयुर्वेद भी था इसमें एक्सपर्ट
    पाषण युग में खेत नहीं थे, तब का खाते थे पुरखे ?
    आज भी जो रहते बर्फ, मरु में, क्या रहेंगे भूखे ?
    जिसको जो रुचता है खाने देवो अपनी देखो लल्ला
    सामिष, निरामिष की काहे की बिन बात का हल्ला
    कोई उल्टा एक्ट नहीं है सब सीधा है मेरी मईया
    वो दूध को सामिष कहते हैं और मांस को भी सामिष भईया



    1. एक समाचार पढ़ा था -
      बिधवा माँ को बेटा  मथुरा छोड़ आया था-
      और दूसरी खबर-
      विधवाओं  का अंतिम संस्कार भी नहीं किया जाता -
      टुकड़े टुकड़े कर के चीलों के खाने के लिए छोड़ दिया जाता है- मथुरा से ही यह खबर भी-
      उधर ही इशारा था -
      त्वरित कुंडली शायद भाव स्पष्ट नहीं कर पाई-
      क्षमा -
      अर्थ का अनर्थ हो गया ||
      सादर -
      इस ब्लॉग पर अबतक 

      २५०० काव्यमयी टिप्पणियां हैं लिंक सहित 
      कभी कभी आते रहिये-

छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे

 कौन सुनता है ? 

खोता रविकर ढोयगा, कब तक अपना बोझ ।
अब उतार कर रख चला, पीठ कर रहा सोझ ।

पीठ कर रहा सोझ, खोज अब कोई दूजा ।

होती चिक चिक रोज, करूँ नहिं तेरी पूजा ।

 काटेगा इंसान, जिन्दगी में जो बोता ।
कहते हैं विद्वान, मजे में जीता खोता ।।

"रूप छलता रहा" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण)  
 सुबह सवेरे ओस भी, बनती गंगा धार ।
बहा रहे गुरुवर यहाँ, पावन छंद बयार ।
 पावन छंद बयार, बड़ी आकर्षक दीखे ।
नव-कवि कुल आ जाव , यहाँ कविताई सीखे ।
छले नहीं यह रूप, धूप चहुँ ओर बिखेरे ।
रविकर गुरुकुल जाय, आज तो सुबह सवेरे ।।

खता,,,
खता बता कर क्या करें, ख़त खतियाना ख़त्म ।
खेल ख़तम पैसा हजम, यही पुरानी रश्म ।
यही पुरानी रश्म, कुबूला जैसी हो तुम ।
शायद भूला रूल, सीध होती नहिं यह दुम ।
तेरे द्वारे आय, भौंकता रविकर प्यारी ।
गरज गरज ठुकराय, रही क्यूँ गरज हमारी  । 

तांडव शंकर दे मचा , नचा विश्व परिदृश्य |
विशिष्ट ऊर्जा जल भरे, करे जलजला पृश्य |
करे जलजला पृश्य, दृश्य नहिं देखा जाए |
जल जाए जब जगत, हजारों जाने खाए |
क्षिति जल पावक गगन, वायू से मंच पांडव |
छेड़ छाड़ कर बंद, नहीं तो झेल तांडव || 

4 comments:

  1. बहुत खूब,रविकर भाई आभार ,,,,,

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  2. आप बहुत श्रम करते हो रविकर जी!
    सभी कुण्डलियाँ सार्थक हैं।

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  3. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स व प्रस्‍तुति।

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