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Monday, 3 December 2012

माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र-


माँ ...

  (दिगम्बर नासवा)  
माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र ।
असमय घटनाएं करें, हालत बड़ी विचित्र ।
हालत बड़ी विचित्र,  दिगम्बर सहनशक्ति दे ।
 पाय आत्मा शान्ति, उसे अनुरक्ति भक्ति दे ।
बुद्धिमान हैं आप, सँभालो खुद को रविकर ।
रहा सदा आशीष,  नमन कर माँ को सादर ।।

अक्स विहीन आईना

संगीता स्वरुप ( गीत ) 
 गीत.......मेरी अनुभूतियाँ
मन को कैसे पोट ली, ली पोटली उतार ।
चुप्प चुकाने चल पड़ी, दीदी सभी उधार ।
 दीदी सभी उधार, दर्प-दर्पण है कोरा ।
नाती पोते आदि, नहीं क्या उन्हें अगोरा ।
शंख सीप जल रत्न , सजा देते फिर दर्पण ।
सजा मजा का साथ, पिरो कुछ मनके रे मन ।




मेरे बिखरे हुये गेसू और उलझी लटें तुम्हारी राह देखती है

DR. PAWAN K. MISHRA  
 झिड़की खा वापस हुवे, बनते तुलसीदास |
रत्ना की भूले सकल, राम रतन-धन पास |
राम रतन-धन पास, नहीं सौन्दर्य उपासक |
अब क्यूँ देखे आस, छोडती स्वेच्छा से हक़ |
है विछोह की लूक, बंद कर मन की खिड़की |
रविकर हो कल्याण, मिले गर रत्ना झिड़की ||


मेरे दो साथी !

अभिसार 
S/O संतोष त्रिवेदी 

डौले डोरेमान के, लेते मन को मोह |
मदद सदा मेरी करे, घुसकर कंदर-खोह |
घुसकर कंदर-खोह, ढूँढ़ प्रश्नों के उत्तर |
पर नटखट सिन्चैन,  उड़ा दे बना कबुत्तर |
सुधरे किन्तु जरूर, होयगा हौले हौले |
हँसता डोरेमान, देख नटखट के डौले |


लिखना, पढ़ना और टिपियाना

smt. Ajit Gupta 
आजादी टिप्पणी की, फिर करना क्यूँ खेल ।
तथ्य समाहित हों अगर, तभी भेजिए मेल ।
तभी भेजिए मेल,  उठा पढ़ने की जहमत ।
 अगर लगे उत्कृष्ट, यथोचित दीजे अभिमत । 
रविकर की कुंडली, श्रेष्ठ रचना की आदी ।
छाप लिंक-लिक्खाड़, टीप की दे आजादी ।।
 HINDI KAVITAYEN ,AAPKE VICHAAR
करते हैं खिलवाड़ तो, रचना बने कमाल ।
शब्द शब्द श्रृंगार रस, चले लहरिया चाल ।
चले लहरिया चाल, मुक्त मुक्तावलि चमके  ।
पड़ोसिनी लघु-कथा, बदन बिजुली सा दमके ।
कहीं मोहिनी रूप, काम-रति कहीं विचरते ।
खुले तीसरा नेत्र, दिखें पर कविता करते ।।



आपने सराहा / बड़ा मजा आया

यह जुबाँ कहती जुबानी, जो जवानी ढाल पर ।
क्या करे शिकवा-शिकायत, खुश दिखे बदहाल पर ।|

  आँख पर परदे पड़े, आँगन नहीं पहले दिखा -
नाचते थे उस समय जब रोज उनकी ताल पर ।।

कर बगावत हुश्न से जब इश्क अपने आप से  -
 थूक कर चलता बना बेखौफ माया जाल पर  ।।

 आँ चूल्हे में घटी घटते सिलिंडर देख कर 
चाय काफी घट गई अब रोक ताजे माल पर ।।  

वापसी मुश्किल तुम्हारी,  तथ्य रविकर जानते-
कौन किसकी इन्तजारी कर सका है साल भर  ||

रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की

छंदों की महिमा विषद, चर्चित शुभ-सन्देश |
कविता रच ले पाठ कर, करे ध्यान अनिमेष |
करे ध्यान अनिमेष, आत्म उत्थान जरुरी  |
सच्चा व्यक्ति विशेष, होय अभिलाषा पूरी |
रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की |
सच्चा हो ईमान, सुनों महिमा छंदों की ||
 हम कहाँ जा रहे रहे हैं

ऋता शेखर मधु 
 मधुर गुंजन
दल दल में नित धँस रहे, किन्तु नहीं एहसास |
अगल बगल बदलाव हो, हों सुविधा के दास |
हों सुविधा के दास, रास आता कंप्यूटर |
घर में लगती क्लास, लगे घर घर में ट्यूटर |
ऊँगली आँखे तेज,  किन्तु हो काया से छल |
मैदानों में भेज, कुर्सियां तो है दलदल ||


10 comments:

  1. माँ से बतियाती ,दुलराती ,पुकारती आर्त नाद करती प्रगाढ़ अनुभूतियों से संसिक्त ,सभी को तदानुभूति कराती सशक्त बताचात माँ के साथ कैसे कह दूं -

    तू अब दीवार पे टंगे फ्रेम में है जब कि मैं हूँ हर दम तेरी ही छाया में पल प्रति पल .

    जीवन के घटित वियोग का ,माँ की आवाज़ में यह एहसास कराना मैं ज़िंदा हूँ ......मन की पीड़ा को मार्मिकता देती है माँ -क्या तू भी तोड़ेगा तिनका ....माँ का अपना पन .....दर्द समय के साथ पकता है .ऊपर घाव दिखाई न दे अन्दर अन्दर पकता रहे .....माँ कभी बूढी नहीं होती ...माँ को कभी मरना नहीं चाहिये

    .माँ ...
    (दिगम्बर नासवा)
    स्वप्न मेरे................

    माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र ।
    असमय घटनाएं करें, हालत बड़ी विचित्र ।
    हालत बड़ी विचित्र, दिगम्बर सहनशक्ति दे ।
    पाय आत्मा शान्ति, उसे अनुरक्ति भक्ति दे ।
    बुद्धिमान हैं आप, सँभालो खुद को रविकर ।
    रहा सदा आशीष, नमन कर माँ को सादर ।।

    ReplyDelete

  2. रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की |
    सच्चा हो ईमान, सुनों महिमा छंदों की ||

    छंद बद्ध करते हैं रविकर निसबासर छंदों को ...

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  3. छन्दोबद्ध रचते रहे रोज़ नया एक छंद ,

    छंद छंद से यों कहे कैसा है भई छंद .

    छंदों की महिमा विषद, चर्चित शुभ-सन्देश |
    कविता रच ले पाठ कर, करे ध्यान अनिमेष |


    करे ध्यान अनिमेष, आत्म उत्थान जरुरी |
    सच्चा व्यक्ति विशेष, होय अभिलाषा पूरी |


    रचते पढ़ते छंद, सुने प्रभु उन बन्दों की |
    सच्चा हो ईमान, सुनों महिमा छंदों की ||

    ReplyDelete
  4. माँ से बतियाती ,दुलराती ,पुकारती आर्त नाद करती प्रगाढ़ अनुभूतियों से संसिक्त ,सभी को तदानुभूति कराती सशक्त बताचात माँ के साथ कैसे कह दूं -

    तू अब दीवार पे टंगे फ्रेम में है जब कि मैं हूँ हर दम तेरी ही छाया में पल प्रति पल .

    जीवन के घटित वियोग का ,माँ की आवाज़ में यह एहसास कराना मैं ज़िंदा हूँ ......मन की पीड़ा को मार्मिकता देती है माँ -क्या तू भी तोड़ेगा तिनका ....माँ का अपना पन .....दर्द समय के साथ पकता है .ऊपर घाव दिखाई न दे अन्दर अन्दर पकता रहे .....माँ कभी बूढी नहीं होती ...माँ को कभी मरना नहीं चाहिये .


    माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र-

    माँ ...
    (दिगम्बर नासवा)
    स्वप्न मेरे................

    माँ को सादर नमन कर, दूँ श्रद्धांजलि मित्र ।
    असमय घटनाएं करें, हालत बड़ी विचित्र ।
    हालत बड़ी विचित्र, दिगम्बर सहनशक्ति दे ।
    पाय आत्मा शान्ति, उसे अनुरक्ति भक्ति दे ।
    बुद्धिमान हैं आप, सँभालो खुद को रविकर ।
    रहा सदा आशीष, नमन कर माँ को सादर ।।

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  5. आभार कविवर।

    आपने तो आज उलझाकर रख दिया। जिस पोस्ट पर क्लिक किया उसी से जुड़ता चला गया।

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  6. बहुत सुन्दर लिंक्स ...
    आभार

    अनु

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  7. a links sajaye hai likkhad ji
    mujhe jagah dene ka shukriya

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  8. उधार उतारा है जो ,लिया हुआ था कर्ज़
    निपटा दिये हैं सारे , थे जो मेरे फर्ज़
    थे जो मेरे फर्ज़ ,न की कोई कोताही
    पोते के मोह में, हो गयी मैं भरमाई
    भरम दूर हो गया , कर लिया खुद में सुधार
    सारे नाते तोल कर ,अब चुकता किया उधार ।


    शुक्रिया

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  9. बहुत ही अच्‍छे लिंक्‍स एवं प्रस्‍तुति

    आभार आपका

    सादर

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