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Sunday, 29 April 2012

अवनति का इतिहास, महाभारत है गाता-

रामायण छोड, भागवत क्यों बांचे ।


सामाजिक उत्थान का, रामायण दृष्टांत ।
श्रवण करे श्रृद्धा सहित, मन हो जावे शांत ।
मन हो जावे शांत , सदा सन्मार्ग दिखाता ।
अवनति का इतिहास, महाभारत है गाता ।
रविकर दे आभार, विषय बढ़िया प्रतिपादित ।
ढोंगी बाबा काज , करे सब गैर-समाजिक ।। 




Saturday, 28 April 2012

आज बड़ों की मस्ती गायब, इसीलिए जीवन भर खरभर

"सबका मन बहलाते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक")


चौबीस घंटे मस्ती कर के , नए रंग दुनिया में भरता ।
मन मैला कैसे हो पाए , प्रेम स्वयं प्रक्षालन करता । 

मस्ती के घंटो से निकले , संस्कार मानवता  के स्वर ।
आज बड़ों की मस्ती गायब, इसीलिए जीवन भर *खरभर ।। 
*शोर-गुल / चिल्ल-पों 
सज्जन खुशियाँ  बांटते, दुर्जन  कष्ट बढ़ाय ।
दुर्जन मरके खुश करे, सज्जन जाय रूलाय ।

फ़ुरसत में ... 100 : अतिथि सत्कार

  मनोज  

सोफा पे पहुना पड़ा, बड़ा लवासी ढीठ ।
अतिथि-यज्ञ से दग्ध मन, पर बोलूं अति मीठ ।


पर बोलूं अति मीठ, पीठ न उसे दिखाऊं ।
रोटी शरबत माछ, बड़े पकवान खिलाऊं ।

रगड़ा चन्दन मुफ्त, चुने खुद से ही तोफा  । 
 गया हिला घर बजट, तोड़ के मेरा सोफा ।


नग्नता पर त्री-गुट ब्लॉगीय चिंतन के बाद.....

देवेन्द्र पाण्डेय at बेचैन आत्मा


आदिकाल की नग्नता, गई आज शरमाय ।
 परिधानों में पापधी , नंगा-लुच्चा पाय ।।  


Friday, 27 April 2012

चढ़ते रहो पहाड़, सदा जय माँ जी कहिये-

कविता

हिम्मत से रहिये डटे, घटे नहीं उत्साह |
कोशिश चढ़ने की सतत, चाहे दुर्गम राह |

चाहे दुर्गम राह, चाह से मिले सफलता |
करो नहीं परवाह,  दिया तूफां में जलता |

चढ़ते रहो पहाड़, सदा जय माँ जी कहिये |
दीजै झंडे गाड़, डटे हिम्मत से रहिये ||


मैंने तो मन की लिख डाली ( भूमिका मेरे गीत की )


दीदी जैसा मुखड़ा मेरा, माथा तेरे जैसा ।
थोड़ी सी झुर्री भी डालो, दो चिंता की रेखा ।

पैरों में चक्कर थे मेरे, आँचल भीगा भीगा -
असमय तुझको छोड़ी बौआ, था किस्मत का लेखा ।

माएं तो सब एक सरीखी, बच्चों को तुम देखो-
उठा कूचिका चित्र बना लो, जो आँखों में देखा ।।

इन दिनों ....

Dr (Miss) Sharad Singh at Sharad Singh



कविता को ऐसा छुआ, बनी कहानी आप ।
बिखरी थी लय बद्ध्ता, तेरा स्नेह-प्रताप ।।


रात आधी, खींच कर मेरी हथेली एक उंगली से लिखा था "प्यार" तुमने ।

  प्रेम सरोवर  


 सरल शब्द में बंध रहा, प्रेम-सरोवर-चाँद ।
 उच्च रूढ़ियाँ थीं खड़ी, कैसे जाये फांद ।।


उनके पास गीत है...!

अनुपमा पाठक at अनुशील


 खुले विचारों वाला जीवन, चाहत उनकी थोड़ी ।
मुक्त गगन उन्मुक्त उड़ाने, गाये गीत निगोड़ी ।

चौबिस घंटे परबस रविकर, मुट्ठी भर ले दाने-

 रोटी कपडा से हुआ, पहले आज मकान ।
खाय विटामिन गोलियां, मानव फिर नंगान ।।

नारी के प्रति सोच को, न बदले नादान ।
देखेगी दुनिया सकल, खुद अपना अवसान ।।

उत्सुकता लेकर चले, अंध-खोह की ओर

"नजर न आया वेद कहीं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


छेद नाव में होने से भी, कभी नहीं नाविक घबराया    । 
जल-जीवन में गहरे गोते, सदा सफलता सहित लगाया ।
इतना लम्बा अनुभव अपना, नाव किनारे पर आएगी -
इन हाथों पर बड़ा भरोसा, बाधाओं को पार कराया ।।

अगर स्वार्थ के काले चेहरे, थाली में यूँ  छेद करेंगे -
भौंक भौंक के भूखे मरना, किस्मत में उसने लिखवाया ।
नाव दुबारा फिर उतरेगी, पार करेगी सागर खारा ।
रखियेगा पतवार थाम के , डाक्टर फिक्स-इट छेद भराया ।।  
 

 "सायरन बजा देवता नचा"



कहता है यह  सायरन , चला  छापने  नोट  । 
वोट दिया तो क्या हुआ, छुप जा लेकर ओट ।।

टी वी विज्ञापनों का माया जाल और पीने की ललक



उत्सुकता लेकर चले, अंध-खोह की ओर ।
तन मन होते खोखले, यह दिल मांगे मोर ।। 

घृणित मानसिकता खड़ी, सड़े गले से  दुष्ट ।
फाँसी के तख्ते चढ़े, हो मानवता पुष्ट ।।

उम्मीदों का सूरज.

shikha varshney at स्पंदन SPANDAN


सूरज लाली ऊष्णता, से जीवन उम्मीद ।
तन मन ऊर्जा प्राप्त कर, सदा मनाओ  ईद ।।

व्यंग्य: है कोई माई का लाल?

संगीता तोमर Sangeeta Tomar at नुक्कड़


चोर चोर मौसेरे भाई. हुई कहावत बड़ी पुरानी  |
सम्बन्ध सगा यह सबसे पक्का, झूठ कहूँ मर जाये नानी ।
जिसने आर्डर दिया दिलाया, जो लाया झेले गुमनामी ।

पुर्जे पुर्जे हुआ कलेजा, हुई मशिनिया बड़ी सयानी ।
सौ प्रतिशत का छुआ आंकडा, होने लगी बड़ी बदनामी ।
कम्बख्तन को पडा मिटाना, इसीलिए भैया जी दानी ।।

नदी और समय

अरुण चन्द्र रॉय at सरोकार
 नदी बाँध से बँधे पर, बहता समय अबाध ।
फिर भी दोनों में दिखे, चंचल साम्य अगाध ।।


 

Wednesday, 25 April 2012

बेचैनी में ख़ास है, अपनेपन के सैन

दिल जार जार है

विषम परिस्थित में अगर, भूले रिश्ते-नात ।  
जिन्दा रहने के लिए, गर करता आघात ।

गर करता आघात, क्षमा उसको कर देते ।
पर उनका क्या मित्र, प्राण जो यूँ ही लेते ।

भरे पेट का शौक, तड़पता प्राणी ताकें ।
दुष्कर्मी बेखौफ, मौज से पाचक फांके ।।

खुशियों का खज़ाना.


आपाधापी जिंदगी, फुर्सत भी बेचैन।
बेचैनी में ख़ास है, अपनेपन के सैन ।

अपनेपन के सैन, बैन प्रियतम के प्यारे ।
सखियों के उपहार, खोलकर अगर निहारे ।

पा खुशियों का कोष, ख़ुशी तन-मन में व्यापी ।
नई ऊर्जा पाय, करे फिर आपाधापी ।।

उभार की सनक बनाम बिकने की ललक !

संतोष त्रिवेदी
बैसवारी baiswari
     
भौंडी हरकत कर रहे, सुविधा-भोगी लोग ।
गुणवत्ता को छोड़कर, निकृष्ट अधम प्रयोग । 


निकृष्ट अधम प्रयोग, देख व्यापारिक खतरा ।
दें अश्लील दलील, पृष्ट पर पल-पल पसरा ।

कब बाबा का भक्त, बने कब सत्ता-लौंडी ।
प्रामाणिकता ख़त्म,  करे अब हरकत भौंडी ।।


हमारी सरकार !


कौवा मोती खा रहा, दाना तो है खीज ।
वंचित वंचित ही रहे, ताकत की तदबीज ।

ताकत की तदबीज, चतुर सप्लाई सिस्टम । 
कौआ धूर्त दलाल, झपट ले सब कुछ हरदम ।

काँव-काँव माहौल, जमाता कुर्सी-किस्सा ।
  है अपनी सरकार, लूट ले सबका हिस्सा ।। 

Tuesday, 24 April 2012

स्नेह-सिक्त बौछार से, अग्नि-शिखा बुझ जाय-

स्मृति शिखर से – 15 : वे लोग, भाग – 5



यायावर की यह कथा, मन के बड़े समीप ।
प्रेम लुटाते जा रहे, कर प्रज्वलित प्रदीप । 

कर प्रज्वलित प्रदीप, अश्व यह अश्वमेध सा ।
बाँध सके ना कोय, ठहरना है निषेध सा ।

सिखा गए संगीत,  गए सन्मार्ग दिखाकर ।
 सादर करूँ प्रणाम, सफ़र कर 'वे' यायावर ।।

तेरा आँचल आवारा बादल

babanpandey at मेरी बात

चाह जहाँ पर है सखे, राह वहीँ दिख जाय ।
स्नेह-सिक्त बौछार से, अग्नि-शिखा बुझ जाय ।। 

कीमत चुकता....

  मो सम कौन कुटिल खल ...... ?
एक रूपये ने किया, असरदार इक काम ।
ग्राहक पक्का हो गया, ठेले तुझे सलाम ।।

बात पते की कह गए, बालक सब्जी खोर ।
ठंडा पानी पी करो, राजा भैया गौर ।। 

पारस तो निर्लिप्त हो, करे काम चुपचाप ।
बढ़ें भाव जिस पिंड के, रास्ता लेवें नाप ।। 


एक चड्ढी कथा

  क्वचिदन्यतोSपि..

चड्ढी बिन खेला किया, आठ साल तक बाल ।
शीतल मंद समीर से, अंग-अंग खुशहाल ।

अंग-अंग खुशहाल, जांघिया फिर जो पा ली।
हुवे अधिक जब तंग, लंगोटी ढीली ढाली |  

चड्ढी का खटराग, बैठ ना पावे खुड्डी ।
घट जावें इ'स्पर्म, बिगाड़े सेहत चड्ढी ।।


बेरोजगारी

  सिंहावलोकन

बड़ा मार्मिक कष्ट-प्रद, सारा यह दृष्टांत ।
असहनीय जब परिस्थित, सहज लगे प्राणांत ।

सहज लगे प्राणांत, प्रशासन की अधमाई ।
या कोई षड्यंत्र, समझ मेरे ना आई ।

पर प्राणान्तक कष्ट, झेल तू प्रियजन खातिर ।
 बिन तेरे परिवार, मिटा दे दुनिया शातिर ।


"बदल जमाने के साथ चल"

Sushil Kumar Joshi at "उल्लूक टाईम्स "


सारे जैसा सोचते, तू वैसा ही सोच ।
बकरी को कुत्ता कहें, मत कुत्ता को कोंच ।

मत कुत्ता को कोंच, लोच जीवन में आया ।
लुच्चों ने ही आज, सदन में नाम कमाया । 

हरिश्चंद के पूत, घूमते मारे मारे ।
करो वही सब काम, करें जो चालू सारे ।।


"मजहब की दूकानों में" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')


भक्त स्वार्थी हो गए, भूल गए भगवान् ।
बुद्धि गिरवी रख करें, ढोंगी के गुणगान ।।

गोरो के रंगरूट ये, काला तन-मन चाल ।
लूट-पाट कर कुकर्मी,  चले ठोंकते ताल ।।  


सीधी रेखा और अपारदर्शी झिल्ली

अरुण चन्द्र रॉय at सरोकार
सुविधा-भोगी छद्मता, भोगे रेखा-पार।
वंचित भोगे *त्रिशुचता, अलग-थलग संसार ।। 
*दैहिक-दैविक भौतिक ताप ।


क्या कहता कबीरा इस पर...

डा. अरुणा कपूर. at मेरी माला,मेरे मोती...
गस्त कबीरा मारता, अक्खड़ ढूंढे खूब ।
कोठे पर पाया पड़ा, रहा सुरा में डूब ।

रहा सुरा में डूब, चरण-चुम्बन कर चहके ।
अपनों को अपशब्द, गालियाँ देकर बहके ।

यह अक्खड़पन व्यर्थ, स्वार्थी सोच बताता ।
फँसा झूठ में जाय, तोड़ के सच्चा नाता ।। 

Monday, 23 April 2012

कहाँ लिखूं मैं क्या कहूँ , बस कहती आभार -

खुद अपने आप से है बेखबर...हमलोग!

डा. अरुणा कपूर

जिम्मेदारी के तले, ऐसे गए दबाय ।
बेसुध की यह बेखुदी, कर ना पाई हाय ।

कर ना पाई हाय, गधे सा खटता रहता ।
उनको रहा सराह, उन्हीं की गाथा कहता ।

खुद को ले पहचान, होय खुद का आभारी ।
कर खुद की तारीफ़,  उठा ले जिम्मेदारी ।।

आभार: Thank you :)


 
कहाँ लिखूं मैं क्या कहूँ , बस कहती आभार ।
नहीं समझ पाई खता, क्यूँ बदला व्यवहार ।।   

आहा मेरा पेड़

Sushil Kumar Joshi at "उल्लूक टाईम्स "
भाई-चारा देख के, चारा भी निर्भीक ।
मीनारों के शहर से, जंगल दिखता नीक ।।


"दोहे-काहे का अभिमान" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

 
 जीवन सूत्रों को रहे, गुरुवर मस्त पिरोय ।
करे आचरण आज से, बुद्धिमान जो होय ।।


यह बाग़ मेरे प्यार का !

  राजेन्द्र स्वर्णकार 

वागा होय विवेक की,  हो माँ का आशीष ।
गति गौरवमय सर्वदा, वैभव सह अवनीश ।।

रेशम निकिता हर्षिता, अलंकार  से साज ।
 दिव्यांशी सा दिव्य यह, राजा रानी राज ।।

Sunday, 22 April 2012

मुखड़े पर मुस्कान, जनाजा निकले धांसू -

समय के साथ


ज़िंदा  है  माँ  जानता, इसका मिला सुबूत ।
आज पौत्र को पालती, पहले पाली पूत ।

पहले पाली पूत, हड्डियां घिसती जाएँ ।
करे काम निष्काम, जगत की सारी माएं ।

 किन्तु अनोखेलाल, कभी तो हो शर्मिन्दा ।
दे दे कुछ आराम, मान कर मैया ज़िंदा ।।  

अंतिम इच्छा

  आवारा बादल -


वाह वाह बस वाह है, नहीं आह का काम ।
सीधी साधी चाह है, निश्चित जब अंजाम ।

 निश्चित जब अंजाम, तयारी पूरी कर लूँ ।
छपा रखे है कार्ड, सही से तिथि को भर लूँ ।

पक्का न्यौता मान, मगर निकले न आंसू ।
मुखड़े पर मुस्कान, जनाजा निकले धांसू ।।

पृथ्वी दिवस पर.......



पेड़ कटे तालाब पटे,
अब जंगल से सटते जाते |
कंक्रीट की दीवारों में,
पल पल हम पटते जाते |

आबादी का बोझ नही जब,
सह पाती छोटी सड़कें -
कुर्बानी पेड़ों की होती
बार बार कटते जाते ||



मुज़रिम


चित्र मार्मिक खींच गया कवि  मांगों पर अब  मौत मिले |
नीति नियत का नया नियंता, भिखमंगो से बड़े गिले | 



मांगे मांगे मांग रहा है, मांगों का लो अंत किया-
दर्द ख़तम सब स्वांग ख़तम, जा रे ले जा मौत दिया ||

सुर्ख लबों पर कड़वी बातें


धोबी माली ठेले-वाला, ड्राइवर हाकर मेले-वाला 
मिश्री-डली घोल के रखती, जैसे हो पहचान पुरानी ।

रंग-रूप यौवन है धोखा, चलते चलते ढल जाएगा-
कडुवाहट से कान पके मम, प्रिये बोल अब मीठी बानी ।।

पेड़ बनाम आदमी


भाव सार्थक गीत के, आवश्यक सन्देश ।
खुद को सीमित मत करो, चिंतामय परिवेश ।

चिंतामय परिवेश, खोल ले मन की खिड़की ।
जो थोड़ा सा शेष,  सुनो उसकी यह झिड़की ।

उत्साही राजेश, साधिये हित जो व्यापक ।
बगिया वृक्ष सहेज, तभी ये भाव सार्थक ।।

Saturday, 21 April 2012

चिंतामय परिवेश, खोल ले मन की खिड़की-

"आज छुट्टी है"


अलीगढ़ी ताला लगे, चाहे चुनो दिवार ।
रविकर के परवेश हित, काफी  एक दरार ।

काफी एक दरार, लगा खिड़की दरवाजा ।
काले परदे साज, सुनेगा गाना बाजा ।

माना है रविवार, मगर ना करो बवाला ।
हम है पक्के यार, तोड़कर आयें ताला ।।

प्रेरक प्रसंग-33 : बरबादी की वेदना

  राजभाषा हिंदी
गांधी जी की वेदना, साहब का सत्कार ।
आधी आबादी जहाँ, है भूखी लाचार ।

है भूखी लाचार, करे बर्बादी कितना ।
भूखे खांय हजार, फेंक देते हैं जितना ।

प्रासंगिक यह लेख, बढ़ी है पुरकस व्याधी ।
बर्बादी ले  रोक, समझ जो बोले गांधी ।।
मन को रोमांचित करें, ये दृष्टांत तमाम ।

ये दृष्टांत तमाम, राग-अनुराग भरे हैं ।
सिनसिनाटी दर्शन, लगे प्रत्यक्ष करे है ।  

बढे सनातन धर्म, विश्व में महिमा-मंडित ।
पर्वों का सन्देश, सुनाएँ  ज्ञानी  पंडित ।।

अमरीकियों की बनिस्पत कमज़ोर हैं भारतीयों के दिल

  कबीरा खडा़ बाज़ार में 
अपने प्रिय खातिर यहाँ, रखे करेज निकाल ।
प्रियतम के इ'स्पर्श से, बांसों मिले उछाल ।  

बांसों मिले उछाल, कलेजे सांप लोटता ।
पत्थर सरिस करेज, कभी सौ टूक टूटता ।

रविकर पाक करेज, कलेजा ठंढा करना
देशी दिल कमजोर, मगर जाने ना डरना ।।    


"नदी के रेत पर" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



रेत नदी की है रखे, पुरखों के पद चिन्ह ।
नव-चिन्हों से वे मगर, लगते इकदम भिन्न ।
 
लगते इकदम भिन्न, यहाँ श्रद्धा ना दीखे ।
खुदगर्जी संलिप्त, युवा मस्ती में चीखे ।

उनको नहीं मलाल, समस्या इसी सदी की ।
पर्यावरण बिगाड़, बिगाड़े रेत नदी की ।।



 

बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष -


पुस्तक आत्मौषधि सही,  सुनो थीब्स का पक्ष  ।
बिन पुस्तक का घर लगे, बिन खिड़की का कक्ष ।

बिन खिड़की का कक्ष, पुस्तकें चखते  बेकन ।
निगल जाय कुछ मस्त, पचाते उत्तम लेकिन ।

पुस्तक पढ़ें मनोज, खरीदें खुद से भरसक ।
प्रेमचंद की बात, मान कर पढ़िए पुस्तक ।।  

रोजमर्रा के दर्द

  उन्नयन (UNNAYANA)

दर्द भी देता मजा -
हम आजमाते जा रहे |
राशन दुकाने ठप्प हैं -
हम गम हमेशा खा रहे |।


काला-बजारी जोर पर-
है कृपा उसकी पा रहे |
टैक्स देते  ढेर सारे-
अब करप्सन ला रहे || 

किसन अर्जुन

  चला बिहारी ब्लॉगर बनने
बजे बधावा जोर से, 'वीणा' के दो साल । 
बड़े 'करीने' से रखी, सब सुरताल संभाल ।

सब सुरताल संभाल, सुनी गासिप 'चौबल' की
कुछ एजेंट विनोद, खबर रखते पल-पल की ।

जो चैतान्यालोक, मनुज भारती पठावा ।
ब्लागे ढोल बजाय, जोर से बजे बधावा ।।

मुझको नींद नहीं आती है.............


नींद उड़ाने वाले सुन ले, 
हो जाये बदनाम कहीं ना ।
पिंड छुडाने वाले सुन ले, 
होवे काम तमाम कहीं ना ।

तूने वीरानापन छोड़ा, 
क्या भूल गई कसमे-वादे
वापस आ जा संग सुला जा, 
मिलता है आराम नहीं ना ।।


"1300वाँ पुष्प" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')



खिलें बगीचे में सदा, भान्ति भान्ति के रंग ।
पुष्प-पत्र-फल मंजरी, तितली भ्रमर पतंग । 

तितली भ्रमर पतंग, बागवाँ शास्त्री न्यारे ।
दुनिया होती दंग,  आय के उनके द्वारे ।

नित्य पौध नव रोप,  हाथ से हरदिन सींचे ।
कठिन परिश्रम होय, तभी तो खिलें बगीचे ।।

यह मन भी ...


मन की मनमानी खले,  रक्खो खीँच लगाम ।
हड़-बड़ में गड़बड़ करे, पड़ें चुकाने दाम ।

पड़ें चुकाने दाम, अर्थ हो जाय अनर्गल ।
ना जाने क्या कर्म, मर्म को लगे उछल-कर ।

सदा रखो यह ध्यान, शीर्ष का चुन लो प्राणी ।
रखिये उसका मान,  रुके मन की मनमानी ।



"फूलों की बातें"

  "उल्लूक टाईम्स

फूलों पर उल्लू फ़िदा, उगले ऊल-जुलूल ।
रविकर जैसे फूल को, जाता फिर से भूल ।

जाता फिर से भूल, बड़े झाड़ों में उलझा ।
उनका बना उसूल, यहीं पर जाएँ मुरझा ।

पर भाई उल्लूक, सितम अब उनके भूलो ।
अवसर यह मत चूक, खिलो खुब जम के फूलो ।।  




 



Thursday, 19 April 2012

आदिकाल से वास, यहाँ पर लोग करे हैं -

कोरबा


पढता जाऊं कोरबा, कौरव पांडू जाति ।
ऐतिहासिक यह क्षेत्र है, बढ़ी हमेशा ख्याति । 

बढ़ी हमेशा  ख्याति, खनिज भण्डार भरे हैं ।
आदिकाल से वास, यहाँ पर लोग  करे हैं ।

सिंहावलोकन करत,  ध्यान से आगे बढ़ता ।
बौद्ध तथा गोदान, श्रेष्ठ रामायण पढता ।।
  शब्द निवेदन में यही, यही शब्द सन्देश |
कविता हो जाते अगर, बढ़ता भावावेश |

बढ़ता भावावेश, माध्यम अच्छा पाया ।
बसे दूर परदेश, पिया के पास पठाया । 

सुरभित सुमन सुगंध, संग में कंटक भेदन ।
शब्द भाव बिन व्यर्थ, बांचिये शब्द निवेदन ।।


केक  और  मिष्ठान  खिलाओ  |
सखी सहेली मित्र बुलाओ |
जन्म दिवस की मंगल बेला-
दीप जला कर ख़ुशी मनाओ |
हैप्पी-बर्थ  डे हैप्पी हैप्पी -
जोर-शोर से गगन गुन्जाओ |
नियमित ब्लोगिंग करते जाओ 
रुनझुन चुन चुन गुनगुन गाओ | 

"नमस्ते हैलो हाय"

  उल्लूक टाईम्स
तब तो परीक्षा केंद्र को ही दीजिये बधाई |
कम से कम एक बार मुलाक़ात कराई |
हम बेकार बेकरार हैं |
आप स्कूटी हैं कार हैं |
उल्लूक टाइम्स पर कैसे पेट्रोल भराई ??


यादों का आईना

  शब्दों का उजाला

सदा हृदय में बारती, यादों का हरदीप ।
हर सुख दुःख में एकसा, मिलते पिता समीप ।।


Wednesday, 18 April 2012

कामप्रेत के कर्म, करे नर से नर'दारा


वैज्ञानिक वरदान यूँ , बन जाता अभिशाप ।
यांत्रिकता बढती चली, भेद पुण्य को पाप ।  

भेद पुण्य को पाप, साफ़ गंगा खो जाती ।
कलुषित नर'दा रोर, नार'की भोग भुगाती । 

कामप्रेत के कर्म, करे नर से नर'दारा ।
चुड़ैल की अघ-देह, बुलाती खोल पिटारा ।।

अनजान बन जाऊं


कृपण हृदय ख्वाहिश करे, करना चाहे अर्पण ।
भाव हुए महरूम शब्द से, झूठ ना बोले दर्पण ।।  

औरत और सब्जी

अरुण चन्द्र रॉय at सरोकार-- 

स्वाद नमक का स्वेद से, मीठा-पन है स्नेह ।
यही दर्द क्वथनांक है, जलती थाली देह ।  

जलती थाली देह , बना करुनामय चटनी ।
धी-घृत से हररोज, चूरमा बेकल-मखनी  ।

अरमानों की महक, ठगे-दिल का दे चूरन ।
पति पर गर कुछ खीस, पुत्र करता मन पावन ।।


गई किताबें हैं कहाँ, जाती झटका खाय ।
शादी उसकी क्या हुई, पुस्तक गईं लुटाय । 

पुस्तक गईं लुटाय, पुस्तकें  सखी सहेली ।
बचपन से हुलसाय, साथ इनके ही खेली ।

शादी ख़ुशी मनाय, दर्द यह कैसे दाबे ।
वापस  दो लौटाय, जहाँ भी गई किताबें ।।



Tuesday, 17 April 2012

नायक इंगित कुछ किये बिना, चुपचाप दिखाता राह चला




दूजे पर निर्णय दे देना, निर्णायक का है सहज कर्म ।
समझा खुद के कुछ सही गलत, या निभा रहा वो मात्र धर्म ।


नायक इंगित कुछ किये बिना, चुपचाप दिखाता राह चला -
आदर्श करे इ'स्थापित वो,  अनुसरण करे जग समझ मर्म ।।


यादों का हसीं कारवाँ....!!!

  .ashok saluja . at यादें... 
 


यादों का साथ अकेला पा, जीवन को सरस बना लेता ।
कुछ कह लेता कुछ सुन लेता, गम के गाने भी गा लेता -


खुशियाँ भी चुन चुन रखे रहे, मुस्काता है शर्माता है -
जो रहे स्वस्थ खुशहाल सदा, वह सारी नियामत पा लेता ।।  

बवाल-ए-बाल



वाह खबा क्या चीज हो, सहता जग परिहास ।
कितना भी चैतन्य हो, तुम लेते हो फांस ।

तुम लेते हो फांस, शर्त की खाय कचौड़ी ।
नाड़ा देते काट, दूर की लाते कौड़ी ।

जौ-जौ आगर जगत, मिले ना तेरा अब्बा ।
खब्ती-याना दूर, गोल कर दे ना डब्बा ।।


मेरे आस-पास कुछ बिखरा सा.......

  my dreams 'n' expressions.....याने मेरे दिल से सीधा कनेक्शन

प्यार बूढ़ दिल मोंगरा, अमलताश की आग ।
 लड़की को कर के विदा, चला बुझाय चराग ।।

सपन संजोते देखा ”

  अरुण कुमार निगम (हिंदी कवितायेँ)
सपना अपना चुन लिया, करे नहीं पर यत्न ।
बिन प्रयत्न कैसे मिले, कोई अद्भुत रत्न ।



रिश्ते

shelley at aahuti



रिश्ते रूपी बेल को, डोर प्रेम-विश्वास ।
स्वाभाविक अंदाज में, ले चलती आकाश ।

ले चलती आकाश, ख़ुशी के शबनम झिलमिल ।
मिलते नमी प्रकाश, सामने दिखती मंजिल ।

पर रविकर कुछ दुष्ट, तापते आग जलाकर ।
पाता है आनंद, बेल को जला तपा कर ।।

वीरू भाई की मांग पर-
ममता में अंधी हुई, अपना पूत दिखाय |
स्वार्थ सिद्ध तृणमूल का, देश भाड़ में जाय |


देश भाड़ में जाय, खाय ले घर का बच्चा |

एक सूत्र जो पाय, चबाती  जाये कच्चा |

देती केंद्र हिलाय, कोप इक क्षण में कमता |
सब नौटंकी आय, चतुर माया से ममता  ।।