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Sunday, 30 April 2017

रविकर के दोहे

सच्चाई परनारि सी, मन को रही लुभाय।
किन्तु झूठ के साथ तन, धूनी रहा रमाय।।

सच्चाई वेश्या बनी, ग्राहक रही लुभाय।
लेकिन गुण-ग्राहक कई, सके नहीं अपनाय।।

मर्दाना कमजोरियाँ, इश्तहार चहुँओर।
औरत को कमजोर कह, किन्तु हँसे मुँहचोर।।

लेकर हंड़िया इश्क की, चला गलाने दाल।
खाकर मन के गुलगुले, लगा बजाने गाल।।

सीधे-साधे को सदा, सीधे साधे व्यक्ति।
टेढ़े-मेढ़े को मगर, साधे रविकर शक्ति।।

विषय-वासना विष सरिस, विषयांतर का मूल।
करने निकले हरि-भजन, रहे राह में झूल।।


जार जार रो, जा रही, रोजा में बाजार।
रोजाना गम खा रही, सही तलाक प्रहार।।

छलके अपनापन जहाँ, रविकर रहो सचेत।
छल के मौके भी वहीं, घातक घाव समेत।।

पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

किस सांचे में तुम ढ़ले, जोबन बढ़ता जाय।
देह ढ़ले हर दिन ढ़ले, रविकर बता उपाय।।

3 comments:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" सोमवार 01 मई 2017 को लिंक की गई है.... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  2. पल्ले पड़े न मूढ़ के, मरें नहीं सुविचार।
    समझदार समझे सतत्, चिंतक धरे सुधार।।

    चतुराई छलने लगे, ज्ञान बढ़ा दे दम्भ।
    सोच भरे दुर्भाव तब, पतन होय प्रारम्भ।।

    किस सांचे में तुम ढ़ले, जोबन बढ़ता जाय।
    देह ढ़ले हर दिन ढ़ले, रविकर बता उपाय।।

    सुन्दर पंक्तियाँ ,आभार।

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